
जब भी तूफान आता है
वह पेड़ सिहर उठता है
उसे मालूम है
कि उसकी जड़ें
कितनी अंदर हैं...
बरगद नहीं गुजरा
कभी ऐसे डर से
क्योंकि
टहनियों से भी
जड़े उसने
टाँगी है..
...
ऐसा भी तूफान है
जब बरगद भी
उखड़ जाता है....
पर डरने से
वो तूफान
कहाँ थम पाता है....
गिरते गिरते..
...गिरे हुए
बरगद की...
उखड़ी हुई
इन साँसों में
विश्वास अमर
हो जाता है....




6 comments:
बहुत सुन्दर.
गिरता ही है हर कोई
किसी दिन
जो खड़ा होता है मैदान में
जड़ें कितनी ही गहरी
क्यों न हों?
बात इतनी है
कौन खड़ा है
कितनी मजबूती से
अपनी जमीन पर।
बहुत सुंदर और सशक्त
बरगद नहीं गुजरा
कभी ऐसे डर से
क्योंकि
टहनियों से भी
जड़े उसने
टाँगी है..
वाह...
***राजीव रंजन प्रसाद
सुंदर अभिव्यक्ति।
सुन्दर अभिव्यक्ति
हर व्यक्ति के विश्वास की परिभाषा अलग है.. कुछ गिरने को अन्त मान लेते हैं और कुछ गिरने को संभल कर चलने का सबक. तुफ़ान भी बडे बडे पेडों को ही उखाड पाता है.. नर्म घास तो झुक कर बच जाती है
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