Sunday, May 11, 2008

विश्वास


जब भी तूफान आता है
वह पेड़ सिहर उठता है
उसे मालूम है
कि उसकी जड़ें
कितनी अंदर हैं...



बरगद नहीं गुजरा
कभी ऐसे डर से
क्योंकि
टहनियों से भी
जड़े उसने
टाँगी है..
...

ऐसा भी तूफान है
जब बरगद भी
उखड़ जाता है....
पर डरने से
वो तूफान
कहाँ थम पाता है....


गिरते गिरते..
...गिरे हुए
बरगद की...
उखड़ी हुई
इन साँसों में
विश्वास अमर
हो जाता है....

6 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर.

दिनेशराय द्विवेदी said...

गिरता ही है हर कोई
किसी दिन
जो खड़ा होता है मैदान में
जड़ें कितनी ही गहरी
क्यों न हों?
बात इतनी है
कौन खड़ा है
कितनी मजबूती से
अपनी जमीन पर।

rakhshanda said...

बहुत सुंदर और सशक्त

राजीव रंजन प्रसाद said...

बरगद नहीं गुजरा
कभी ऐसे डर से
क्योंकि
टहनियों से भी
जड़े उसने
टाँगी है..

वाह...

***राजीव रंजन प्रसाद

mamta said...

सुंदर अभिव्यक्ति।

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर अभिव्यक्ति

हर व्यक्ति के विश्वास की परिभाषा अलग है.. कुछ गिरने को अन्त मान लेते हैं और कुछ गिरने को संभल कर चलने का सबक. तुफ़ान भी बडे बडे पेडों को ही उखाड पाता है.. नर्म घास तो झुक कर बच जाती है