Monday, May 12, 2008

नोक झोंक


चाहे चाँद आँखो में
बिठाकर
ज़रा मुस्कुराकर
दे दो ...देखो ...
मैं नहीं मानूँगी.....

चाहे लहरें गिना दो
उसमें से थोड़ी सी
लाली उठाकर
लगा दो
मैं नहीं मानूँगी.....

गाल पर गिरती
गीली नमी
नमकीन से
मीठा बना दो
मैं नहीं मानूँगी.....

थाम कर हाथ मेरा
नापसंद सारी
लकीरें मिठा दो
मैं नहीं मानूँगी.....

मनाते मनाते
अगर रूठ जाओ...
हँसाते हँसाते
अगर रो पड़ो तो....
सोचूँगी....
....शायद....
मैं नहीं मानूँगी.....
.............................



मनाया नहीं
और आँखों में चँदा
बिठाया नहीं
लहरों को लेकर
भिगोया नही
हाथ को थाम कर
लकीरे मिलाई नहीं
मेरे साथ में गर
हँसे तुम नहीं
रोते हुए
आँख नम ना हुई....

तो फिर....
................
सच में
रूठ जाऊँगी मैं.....

12 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत खूब, वाह!!

हर्षवर्धन said...

रूठिएगा नहीं।

मीत said...

वाह ! वाह !

दिनेशराय द्विवेदी said...

ये सौदा बहुत महंगा है,
शर्ते पूरी होने पर भी गारंटी नहीं
सिर्फ सोचा जाएगा।

सुशील कुमार said...

रुठना मनाना, फिर मान के रुठ जाना।
यही तो जिंदगी है
कभी लगता है कि जिदंगी रुठ गई कभी लगता है कि जिंदगी मान गई।
वैसे रचना मन को भा गई।

Parul said...

थाम कर हाथ मेरा
नापसंद सारी
लकीरें मिठा दो
मैं नहीं मानूँगी.....
:))--aisey koi kehtaa hai bhalaa?yaqeenan aap hi ..:)

DR.ANURAG ARYA said...

गोया की आपके रूठने के भी अंदाज निराले है......बहुत खूबसूरत....

मीनाक्षी said...

बहुत खूबसूरत ख्याल ...रूठने का अन्दाज़ मन मोह गया..

ajay kumar jha said...

beji,
saadar abhivadan, bhai wah ruthne aur manane kaa ye andaaz pasand aaya.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अजित जी के सफ़र ने
यहाँ तक पहुँचा दिया.
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आपकी काव्य-प्रतिभा की प्रशंसा सुनी थी,
लेकिन आज सिर्फ़ एक कविता पढ़कर
जो शिद्दत,संवेग और सुलझी हुई अभिव्यति
मैं देख रहा हूँ उसकी गवाही में कह सकता हूँ कि
जीवन के सुकोमल और केंद्रीय स्वर की
आप राग-सिद्ध कवयित्री हैं.
ऐसी रचनाएँ अंतरतम को निचोड़कर ही
जन्म लेती होंगी.
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बधाई
डा.चंद्रकुमार जैन

सोनू उपाध्‍याय said...

Aap ki kavitain behtarin aur stariya hain...

Lagatar likhte rahiye...

सोनू उपाध्‍याय said...

Aap ki kavitain behtarin aur stariya hain...

Lagatar likhte rahiye...