
अपने समय में
समाज में
खड़े रह सकने के लिए
जड़ हुई हूँ
जड़ों से ज़मीन
पकड़ी है
अपनी उड़ान
और गति की
बलि दी
कि मेरी ड़ाल पर
फूल उगे
फल लगे
आसमान के
एक छोटे से टुकड़े पर
अपनी शाखायें ड़ाल
खुश होती हूँ
अपनी ऊँचाइयों पर...
...........
मुझे अपने
खड़े रहने का रंज नहीं
मिट्टी से जीवन बनाना
इसी तरह सँभव है
लेकिन मूक सृजन
मे एक अजीब बेबसी है
मेरी अपनी कोई आवाज़
नहीं है
बस हवा की साँय साँय
.....
जैसे मुझे छूकर
उसका मौन
गूँज रहा हो
........
शायद इसीलिए
उनमुत्त ख्वाबों ख्यालों को
कभी रोका नहीं
बनाने दिया घोंसला
अंडों में उड़ान के सपनो
को पनपने दिया
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले
....
और मेरे ठहराव को...
उड़ान.....




12 comments:
बेहतरीन रचना
बड़ी सुंदर सकारात्मक सोच. "अंडों में उड़ान के सपनो
को पनपने दिया
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले"
बधाई हो. आभार.
http://mallar.wordpress.com
शायद इसीलिए
उनमुत्त ख्वाबों ख्यालों को
कभी रोका नहीं
बनाने दिया घोंसला
अंडों में उड़ान के सपनो
को पनपने दिया
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले
....
और मेरे ठहराव को...
उड़ान.....
man se sachchi bhaawnye wakt ki hai ...
bahut sunder
आप बहुत अच्छा लिखती हैं कविता बसेरा दिल को छू गयी.....बधाई
beautiful..beji
इतने सुंदर लेखन के लिए बहुत बहुत बधाई।
वाह!
उड़ान?
नींव के पत्थर की?
बहुत अच्छी कविता है। बहुत बहुत बधाई.
ये शब्द भी तो वहीं से पनपे हैं। अच्छी कविता।
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले
....
और मेरे ठहराव को...
उड़ान.....
--क्या बात है, बहुत खूब, बेजी. गजब!!!!
kya baat hai
narayan narayan
चंद पंकितयों ने बहुत ही गहरी बात कह गई। बहुत खूब।
शायद इसीलिए
उनमुत्त ख्वाबों ख्यालों को
कभी रोका नहीं
बनाने दिया घोंसला
अंडों में उड़ान के सपनो
को पनपने दिया
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले
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