Saturday, November 01, 2008

बसेरा













अपने समय में
समाज में
खड़े रह सकने के लिए
जड़ हुई हूँ
जड़ों से ज़मीन
पकड़ी है
अपनी उड़ान
और गति की
बलि दी
कि मेरी ड़ाल पर
फूल उगे
फल लगे
आसमान के
एक छोटे से टुकड़े पर
अपनी शाखायें ड़ाल
खुश होती हूँ
अपनी ऊँचाइयों पर...
...........
मुझे अपने
खड़े रहने का रंज नहीं
मिट्टी से जीवन बनाना
इसी तरह सँभव है
लेकिन मूक सृजन
मे एक अजीब बेबसी है
मेरी अपनी कोई आवाज़
नहीं है
बस हवा की साँय साँय
.....
जैसे मुझे छूकर
उसका मौन
गूँज रहा हो
........

शायद इसीलिए
उनमुत्त ख्वाबों ख्यालों को
कभी रोका नहीं
बनाने दिया घोंसला
अंडों में उड़ान के सपनो
को पनपने दिया
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले
....
और मेरे ठहराव को...
उड़ान.....

12 comments:

आदर्श राठौर said...

बेहतरीन रचना

PN Subramanian said...

बड़ी सुंदर सकारात्मक सोच. "अंडों में उड़ान के सपनो
को पनपने दिया
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले"

बधाई हो. आभार.
http://mallar.wordpress.com

manvinder bhimber said...

शायद इसीलिए
उनमुत्त ख्वाबों ख्यालों को
कभी रोका नहीं
बनाने दिया घोंसला
अंडों में उड़ान के सपनो
को पनपने दिया
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले
....
और मेरे ठहराव को...
उड़ान.....
man se sachchi bhaawnye wakt ki hai ...
bahut sunder

adil farsi said...

आप बहुत अच्छा लिखती हैं कविता बसेरा दिल को छू गयी.....बधाई

Parul said...

beautiful..beji

संगीता पुरी said...

इतने सुंदर लेखन के लिए बहुत बहुत बधाई।

Dineshrai Dwivedi दिनेशराय द्विवेदी said...

वाह!
उड़ान?
नींव के पत्थर की?

raj said...

बहुत अच्छी कविता है। बहुत बहुत बधाई.

वर्षा said...

ये शब्द भी तो वहीं से पनपे हैं। अच्छी कविता।

Udan Tashtari said...

ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले
....
और मेरे ठहराव को...
उड़ान.....


--क्या बात है, बहुत खूब, बेजी. गजब!!!!

नारदमुनि said...

kya baat hai
narayan narayan

सुशील कुमार छौक्कर said...

चंद पंकितयों ने बहुत ही गहरी बात कह गई। बहुत खूब।
शायद इसीलिए
उनमुत्त ख्वाबों ख्यालों को
कभी रोका नहीं
बनाने दिया घोंसला
अंडों में उड़ान के सपनो
को पनपने दिया
ताकि उनके कलरव में
मुझे आवाज़ मिले