Sunday, November 16, 2008

मार्ग












पगडंडियों से पहुँचे मंजिलों की
एक अलग बेबसी है
जो उनपर चलना छोड़ दो
रास्ते गुम जाते हैं....

................

पक्के रास्ते ना बने तब तक
आते जाते रहो....
यूँ ही चलते चलते
रास्ते बन जाते हैं...

7 comments:

विनय said...

पगडंडियों से पहुँचे मंजिलों की
एक अलग बेबसी है
जो उनपर चलना छोड़ दो
रास्ते गुम जाते हैं....

बहुत सुन्दर!

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http://vinayprajapati.wordpress.com/
http://www.vinayprajapati.co.cc/

विवेक सिंह said...

सही कहा !

makrand said...

bahut sunder rachana
regards

मोहन वशिष्‍ठ said...

पगडंडियों से पहुँचे मंजिलों की
एक अलग बेबसी है
जो उनपर चलना छोड़ दो
रास्ते गुम जाते हैं....

................

पक्के रास्ते ना बने तब तक
आते जाते रहो....
यूँ ही चलते चलते
रास्ते बन जाते हैं...

बहुत ही सुंदर रचना है आपकी आभार

मोहन वशिष्‍ठ said...

बिल्‍कुल सही कहा आपने आभार

अफ़लातून said...

गजब !

दीपक said...

क्या खुब कही आपने !! जे बहुगणां गता ते पंथा !!