Tuesday, November 25, 2008

शाम साथ में












थोड़ी शाम दे दो
लगा दूँ
जिंदगी का तड़का....
चटक कर पहर जब
बदलने लगे
स्वाद जीने का
उसमें आने लगेगा...

मेरे हाथ की
शाम का जायका
पसंद है
बखूबी जानती हूँ

....पर
कहाँ रोज़ देते हो
शामें मुझे...
कि पसंद मैं तुम्हारी
निभाती चलूँ

4 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

हो जाती कविता
बातें छोटी छोटी
शब्द आप के हों

कंचन सिंह चौहान said...

waah kya baat hai... kya shabda...!

दीपक said...

नये बिंबो के साथ जायकेदार लगी यह कविता !!

bahadur patel said...

kavita sundar. chitra sundar hai.