Wednesday, December 31, 2008

चाह











सुनहरी गुलाबी घटा दे दो
समंदर की नमकीं हवा दे दो
थोड़ी अलग सी ज़मीं दे दो
एक टुकड़ा नया आसमाँ दे दो

जाने पहचाने आगोश में
शरारत कोई नयी दे दो
आँखो की चमक में आज
पहचान थोड़ी बदल दे दो

मेरे हाथों की लकीरों में
मकसद कुछ और हसीं दे दो
साथ मेरे चल कर के
रास्तों को मंजिल दे दो

गुलाबी मैं सुनहरे तुम
चलो सूरज डुबा आओ
सोने सी सुलग जाऊँ
बरस तुम जिंदगी दे दो...

5 comments:

"अर्श" said...

सबसे पहले तो आप और आपके समस्त परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.
बहोत ही खुबसूरत कविता

ढेरो बधाई आपको...
अर्श

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

नए साल की असीम शुभकामनाएँ...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

खूबसूरत कविता है! सभी की चाह समेट ली है आपने!
नया साल खुशियाँ लाए!

विनय said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, नववर्ष की शुभकामनाएँ

शुभम आर्य said...

नया साल आए बन के उजाला
खुल जाए आपकी किस्मत का ताला|
चाँद तारे भी आप पर ही रौशनी डाले
हमेशा आप पे रहे मेहरबान उपरवाला ||

नूतन वर्ष मंगलमय हो |