Tuesday, January 29, 2008

कौशल

राह चलते हुए
रास्ते में यूँ ही
थोड़ी मिट्टी
थोड़ा पानी

लगा नाम इसका
कोई आम होगा
कीचड़ ही शायद
अंजाम होगा

कुछ गजब साथ का
कुछ हुनर हाथ का

मंदिर में जले
वो दिया हो गया....

Saturday, January 26, 2008

तथ्यान्वेषण

आसमान भी उखड़ कर
उड़ता चला
क्या तम्बू
बराबर गड़े ही नहीं थे?!!

छत के नीचे से बाहर
पग पर ही चलो
पर के लिये
नभ बने ही नहीं थे।

पँख का प्रारूप तो था
उड़ान के ही खातिर
जिगर में ही शायद
हौसले नहीं थे….

ठिका जो सके
नभ को नभ की जगह पर
इरादों में तम्बू
धंसे ही नहीं थे!!

Thursday, January 24, 2008

मनोरथ

सूर्य के ढ़लने से पहले
धूप की फसल काटनी है
कड़ी धूप में बढ़ी
ठंडी छाँव छाँटनी है

नेह के तार टूटने से पहले
स्नेह सी कोई धुन छेड़नी है
तरंगों में लीन अनुरक्ति
रूह में सहेजनी है

छूटते हुए हाथों में से
स्पर्श की धूल समेटनी है
कुछ याद संग बिखेरनी है
कुछ कल साथ लपेटनी है....

Monday, January 21, 2008

साजिश

सभ्यता की साजिश है
फूलों को इत्र की बोतलों में
कैद करते हैं
बरगद के पेड़ को
गमले में
खड़ा करते हैं
पलास्टिक की बेलें
चढ़ाकर
फिर उसकी जड़ों का
इंतज़ार करते हैं

हर बार रिश्तों को
एक नाम देते है
पहचान को
सीमाओं में बाँध देते हैं
फिर उसे सही गलत का
इनाम देते हैं

तितली के पँख से
रंग झाड़ देते हैं
घूमते पँखे को
हवा का नाम देते हैं
उड़ान को पहिये पर
उतार देते हैं

नई जुदा पहचानों के
लिबास में
हर रोज़
खुद को
छिपा आते हैं….
गुमा आते हैं

Friday, January 18, 2008

प्रारब्ध

स्पर्श की तपिश से
पिघलकर कभी
रो सकोगे
कि यूँ ही
जलते रहोगे ?



खान में पड़े
जल जलकर
कोयला रहोगे
हीरा कभी बन सकोगे ?



क्या पत्थर ही बन
मिट्टी में गुम
जौहरी के हाथ
लग सकोगे ?



तुम्हारी चमक
से नहला सके
इज़ाजत कभी
दे सकोगे ?



स्पर्श की तपिश से
पिघलकर कभी
रो सकोगे
कि यूँ ही
जलते रहोगे ?!!

Thursday, January 17, 2008

उड़ान भरो अब

शब्द से मैने पँख बनाये
बादल पर टंगा कर रखे हैं
जिस रास्ते से आसमाँ पर पहुँची...
सपनों के बीज बिछे हैं....

खुद की जकड़ से
बाहर जो निकलो...
क्षितिज की तरफ पगड़डी दिखेगी
नन्हे से पौधे सपनों के होंगे
वहीं से आसमाँ तक पहुँचो

तुम्हारी ही माप के पँख बने हैं...
बादल से इनको उतारो....
जहाँ आसमाँ तुम्हारा हो फैला
पँख फैला कर
उसे अपना बना लो.....

Wednesday, January 16, 2008

तासीर

मेरे ख्याल को
तुम्हारे जहन में उछाल
भीतर झाँकने लगी

तुमने यूँ ही स्वीकार कर लिया
किसी अपरिष्कृत हीरे की तरह....

मुझे अहसास है
इसके पथरीले,खुरदुरे विषम
कोनों का

हीरों सी कीमत
तो आँकी नहीं कभी....

कंकड़ समझ ही
उछाला था
तुम्हारी ओर

मनोवेग का अनुमान मात्र
ध्येय था...

किन्तु....तत्व उभरने लगे हैं
कोने चमकने लगे हैं....

तुम्हारे असर में
कंकड़ भी
बदलने लगे हैं.....

Sunday, January 13, 2008

वात्सल्य

पतंग जो अटकी है
ड़ाली पर आकर
बाबुल उतारो ना

अंटी,पताशे
नारंगी गोलियाँ
मुझको दिला दो ना


लट्टू घुमाना
साईकल चलाना
मुझको सिखा दो ना

गोदी उठा कर
भैया से लंबा
मझको बना दो ना

मेला घुमाओ
दुल्हन सी कोई
गुड़िया दिलाओ ना


कोई पुरानी
छोटी कहानी सुना कर
सुला दो ना

रूठे यूँ मुझसे
बैठे हो क्यों
मुझको रुलाओ ना

ज़रा मुस्कुरा दो
गले से लगा लो
मेरे पास आओ ना.....

Saturday, January 12, 2008

सचेत

सँभल सँभल कर
चल जिंदगी
कहीं घंस ना जाये...
चोर बालू है
हर तरफ
कहीं फिसल ना जाये
कोई पँख ही
शायद मिले कहीं
थोड़ा ज़मीं से पग
उठ जाये
ठोस धरा पर
फिर कदम रख
कदम सँभल जाये....
.....काश...
...जिंदगी सँभल जाये

Tuesday, January 08, 2008

सहचर


कच्चे ऊन सी
एक सुबह पकड़
तू और मैं
समय की सूई से
बँधते बिछड़ते
कल्पना से हकीकत
में उतरते गये


रंग से रंग जोड़ कर
पक्के रंगों के रूप में
सूई के साथ
चलते गये

रंगबिरंगी शामों से
रौशन दोपहरों को जोड़
रात में संग संग
ढ़लते गये
......
लम्हें बुनते गये
चुनते गये
जिन्दगी बनते गये.....