Thursday, February 28, 2008

तलाश

तलाश ज़ारी है...
मन के मंजिल की...
क्या पता कहाँ है...
हर रोज़ कुछ बदली सी दिखती है....
रोज़ कुछ कदम मैं इसकी तरफ...
रोज़ यह थोड़ा और सरक जाती है....


आसमान से उस दिन बादलों को देखा था...
अलग अलग रूप में ढ़लने की बड़ी जल्दी थी उन्हे....
लगातार एक सिरा अंदर चला जाता...
और दूसरी तरफ से बाहर.....
कुछ गुणा जोड नहीं...
पर रूप बदलता रहता.....


मैं सोचती हूँ नीर के इन कणों के बारे में....
नूर सा उठ बादल भी बन गये...
इतना ऊपर.....
.....पर नीचे....
समंदर में ...
पहाड़ों में ...
घाटियों में ...
रेत पर....
अपने सायों को लगातार घसीटते हुए.....


शायद इस खिंचाव से
थक हार कर ही ...
बरस जाते हैं यह....

तप के कितना भी ऊपर उठें....
फिर तरल बन जाते हैं.....


रूप बदल जाते हैं....
जगह भी.....
सायों को अपने अंदर ...
नहीं तो बाहर...
पर साथ में लेकर चलते हैं....

सायें छिपा भी लें...
मिटते नहीं है...
कहीं अंदर बसे रहते हैं...
थोड़ी रौशनी की फिराक में...
फिर बाहर....

शायद मैं इन्ही सायों से दूर
जाना चाहती हूँ....
मंजिल के आभास के बिना....
मंजिल की ओर नहीं...
बस सायों से दूरी बनाना चाहती हूँ....

पर मैं....
जितना रूप में हूँ
उससे ज्यादा सायों में हूँ....
शिखर पर पहुँच कर भी....
नीचे ज़मीं का जायका
बना रहता है....

हर शिखर की तस्वीर की
एक नेगाटिव
सायों में सिमट जाती है.....
सच सायों में...
या शायद सायों में सच
कैद हो जाता है....


कहीं भी जाऊँ...
इसीलिये लौट वहीं फिर आती हूँ...
हर तलाश को....
रौशनी में...
सायों से बिछुड़....
गुमा आती हूँ.....

Wednesday, February 27, 2008

उसका जादू

जादू हाथ की सफाई
होती है.....
टोपी से तोता
मुट्ठी से रुमाल

वह कुछ अलग
किस्म का जादू जानती है...

कभी हँसा आती है...
रुला देती है.....
कभी पलकों के भीतर
सपने सुला आती है

कुछ अदा में यूँ इठलाती है
कि फूल खिल जाते हैं
बरसात की बूँदाबांदी
इंद्रधनुष
बन जाता है....
बादल
फूलों सा झर जाता है...

तभी तक
जब तक
वह सामने है
और सामने वाला
सम्मोहन में

......बाकी यह जादू भी
हाथ की सफाई है....

Monday, February 25, 2008

पेन्डुलम


जीवन का बिंदुरेख
कुछ ही बिंदुओं पर
निरंतर लौट जाता है.....

निदोल की गति सा
केन्द्र पर हर बार
लौट के गुजर जाता है....

हर पल....कालद दर से
अग्रसर...
उसी बिंदु की तरफ...

रुकता नहीं...
ठहरता नहीं...
पर पहुँचना चाहता है

अगर रोक दूँ
यह गति
वहीं...
ठीक केन्द्र पर
कालद स्पंद में
एक अंतरायन....

शायद...
समय रुक जाये
मिट जाये
युगांतर से चली
यह तृष्णा
परितृप्त...

नहीं तो
फिर
टिक टिक
कालद आवृत्ति...
वही बिंदु निरंतर.....
ना ओज का संचार
ना पतन...

......और फिर खत्म
एक जीवनकाल.....

Sunday, February 24, 2008

पुष्पित

लम्हों को
नियम से बँध
कुछ इस तरह
खुलना होगा

पँखुडियों की
अदा सा
रंग में डूब कर
खिलना होगा

अधखुली
बात को
धीरे से
महकना होगा

जीवन के
केन्द्र के
आसपास
जुटना होगा

आलोक को
आलिंगन में
बाँधने के लिये
उठना होगा

नमी की
दो बूँद
सँभालने के लिये
रुकना होगा

बिखरने से पहले
हौले से
लम्हों को ....लम्हों का हाथ
पकड़ना होगा

जिन्दगी
तुझको तो
सुमन सा ही
संवरना होगा......

Tuesday, February 19, 2008

प्रतिबिंब

मुझे
तुम्हारी आँखों में झाँकना
अच्छा लगता है
अपनी छवि को
समस्त सँभावनाओं
के साथ देखना
कितना सहज है यहाँ
तुम्हारी आँखों में
मेरे हर रूप की स्वीकृति है


कभी कोई तुम्हे
एकदम से भा जाती है
और तुम झट पलक बंद कर
उसे याद के बक्से में
छिपा देते हो
कई बार
कोई पहचान के रंग
भूल जाती हूँ
तब
तुम्हारी आँखों में
इन्हे टटोल
आती हूँ

.......
हर बार जब भी
देखते हो मुझे
किनारे
कभी काटते नहीं
कोई खाँचा नहीं
जिसमें
ढ़ालते हो मुझे
बदलती रौशनी में
बदलती परछाई के साथ
देखते हो मुझे


.....



मेरे शब्द
और उनके अर्थ
मेरी आवाज़
अंदाज़
और अदा
मुझे सुनते हो तुम...
देखते हो तुम...
जानते हो तुम

मुझे
तुम्हारी आँखों में झाँकना
अच्छा लगता है

असर

कुछ टुकड़ों में
अस्तित्व
बिखरा हुआ था....

अनुभूति ने
तत्व को
पंक्तिबद्ध किया....

उत्तर और दक्षिण
...दिशा का...
आभास दिया

चुम्बक की तरह
यूँ छूकर गया...
अपने आकर्षण से
मनमोहक बना के गया....

Sunday, February 17, 2008

मन की गाँठ

बात को सिरे से
उठाकर
हाथ की उँगलियों में
पिरोया
मीनार सा फिर
बना कर
उसे ठुड्डी पर चढ़ाया
ख्याल से थोड़ा उलझा...
कुछ खिंचा
अंगूठे के सिरे से...
आवेग आवेश
के बीच
हिलाते झुलाते
उलझते सुलझते
बनते बिगड़ते
गाँठ पड़ गई।

Saturday, February 16, 2008

काजल

काजल सपनों के
बहुत करीब रहती है
अपनी गिरह में
इन्हे सँभाले
रखती है...

जो छलक जाये कोई
सपना कभी
आँसू में
घुल के
उतर आती है
बिखर जाती है.....

Friday, February 15, 2008

कशिश

धूप है
बिछी हुई
बात है
रुकी खड़ी
साथ में
तरंग है
तरंग से
जुड़ रही


लौह से
बदन के
स्वरूप में
जो रूह है
तरंग के
चूमने पर
झूम कर
वह उठ रही

चुम्बक के
चुम्बनों पर
मिट रही
उठ खड़ी
मिल रही
सिमट रही

तरंग से
.......
वह
जुड़ रही

Wednesday, February 13, 2008

पुनरावृत्ती

अक्सर किताब
उलटते पुलटते
एक ही पन्ने पर
आकर
खुल जाती है

किनारों से मुड़ा
वो पन्ना
लगातार स्पर्श से
पीला पड़ा
जाने पहचाने
शब्द लिये
बार बार उभर
आता है

हर बार
एक नया पृष्ठ खुले
उससे पहले
फिर एक बार
यह
आँखों के आगे से
गुजर जाता है...
सपर्श के हाथों में ठहर....
फिर निकल जाता है

Tuesday, February 12, 2008

ज्वालामुखी

ख्याल..
सतह के नीचे
कुलबुलाते हुए
बेचैन
कोई अभिव्यक्ति
बनने को अधीर
कैद अहसासों की
जकड़ से
पकड़ से
निकलने का
कोई रास्ता
कहीं कोई
कमज़ोर परत
जहाँ से
मुक्ति की
कोई राह
द्रुतपुंज सा
ऊपर उठता
पिघलते हुए
द्रव्य सा
गिरता छलकता
गर्त से
उत्पन्न
काव्य सा....

Wednesday, February 06, 2008

विलय

सीसे की सीढ़ी से
उतरते अक्षरों में
कलम
अक्सर छोटी हो जाती है...

कुछ कतरन में
कुछ छीलन में
सिमटे कलम की.....

कितनी पहचान
उस कहानी में
होती है....

जिसे वह
...लिख कर आती है??

Saturday, February 02, 2008

प्रतीक्षा

विशाल वट
विस्तृत शाखायें
उनमुक्त गगन
स्वच्छन्द मन
मज़बूत मूल
फल और फूल

डिब्बी में बंद
छोटा सा कद
बीज में लीन
नींद में तल्लीन
खोया हुआ
सोया हुआ

अनंत में
अंत सा....
अंकुर के
आरंभ के
आगे का
अंतराल