Monday, March 31, 2008

फैन्टम शैडोज़


पूरी एक रात के अँधेरे को
काट काट कर
नाप के ...माप के....
साये बनाती रही.....
ताकि....
दिन के उजालों में....
यह साये पहना कर
मन में दुबके
ख्यालों को ...सवालों को....
आज़ाद कर दूँ.....

Sunday, March 30, 2008

आलम्बन


अभी हथेली ना
थामो....

नई कुछ लकीरें
गीली पड़ी हैं....

सँभलते सँभलते
हाथों में खुदीं थी...

सँभाला अगर तो,
कहीं मिट ना जायें....

Friday, March 28, 2008

बैन्किंग एफेक्ट

मोड़ पर हमेशा
गति धीमी
पड़ जाती है.....

हर बार
यहीं आकर
कुछ अटक सी
जाती है......

तजुर्बा भी
कहाँ रफ्तार बढ़ा
पाता है

यादों की स्मृति
घुटन सा जकड़
जाती है.....
............................

आज यादों से
कुछ दूरी
बनानी होगी....

रफ्ता रफ्ता
रफ्तार
बढ़ानी होगी

यह मोड़ ज़रा
जल्दी गुजर जाये
अगर.....

तो शायद
आसां
हो जायेगा.....सफर

भौतिक-विज्ञान में हमेशा रुचि रही है। बैन्किंग एफेक्ट भी हमारे जीवन में प्रासंगिक है। मोड़ पर एक सीमा के आगे गति नहीं बढ़ाई जा सकती। अगर गति बढ़ानी हो तो रेडियस.....वृत्त की गोलाई ही बढ़ानी पड़ती है। केन्द्र का आकर्षण, मोड़ लेने वाली चीज़ का 'मास' और 'इनर्शिया', 'फ्रिक्शन'...यह सभी इस सीमा को निर्धारित करते हैं। सुजाता की टिप्पणी के बाद यह टीप जोड़ रही हूँ। कुछ आलस...कुछ यूँ ही...अपनी कवितायें समझाने की जहमत अक्सर नहीं उठाती। :))

Thursday, March 27, 2008

शरीक

तुमने सोचा
दर्द छिपा कर रखोगे
मेरे सामने
मुस्कुराते रहोगे
मेरी चमक पर
आँच आये ना कोई
मुझे दूर ही
सँभाले रखोगे......

नहीं जानते क्या
इतना अभी भी....?!
मेरी चमक...
ओस सी ही नमी है....!
सीप सी ही है
हस्ती मेरी हमेशा...।
दर्द बाँटोगे ना तो...
कैसे मोती रचूँगी....?!

Wednesday, March 26, 2008

प्रबोध

थोड़ी सी धूप
अनमनी सी छनी
उस सूराख से
मन में....

अँधेरों में गुम
नन्हे से कण
उजाले पहन
जहन में.....

धडकनों की धुन पर
नब्ज़ में चल रहे
एक नये सुर में
तन में
..................

सूराख बंद कर
धूप को रोक दो
फिर जुटो...रूह के
दमन में

कहीं रूह...मिल गई
रौशनी से....फिर
क्या रहेगा
कण कण में ?!!

Monday, March 24, 2008

दूरी

किसी वृत्त में
दो बिंदु की तरह मिले....
पास पास
मैं आगे थी...वो पीछे...
अजीब जिद थी
कि बीच का फासला
मैं तय करूँ...
...
और बस यूँ ही
फासले बढ़ गये

स्वाद

एक चम्मच भर
थोड़ी शाम चखी
.....मीठी थी....
क्षितिज से उतरते उतरते
नमकीन हो गई....

Sunday, March 23, 2008

उदास घटा


आज रात
पिछवाड़े से
उस बदली तक,
एक पगडंडी
लेनी है...

कई दिन से
वो पगली
सूरज को
पकड़ कर बैठी है

....शायद...

अंतरंगता से
मेरे दामन में
वो रो ले.....

और सुबह
सूरज फिर
अलवण किरण की
रौशनी से खेले...

Saturday, March 22, 2008

पारस


सूरज की एक किरण
लहर से उलझ गई
रंग में बिखर कर....
भीतर उतर गई...
मीन पर रजत सी
कंकड़ से सिमट गई.....
कभी बुलबुले सी
मोती सी पनप गई

बस जिसे...
छू गई...
रजत रंग संवर गई
लहर पर थिरक गई...
किरण सी चमक गई
प्रकाश सी ढ़ल गई

Monday, March 17, 2008

मिरर इमेज



आईना देख ही
पहचाना है अक्सर
तुम्हारी आँखों में भी
कुछ कुछ ऐसी ही दिखती हूँ मैं
......
पर हकीकत में कैसी दिखती हूँ
मैं नहीं जानती

कागज़ के पँख

कागज़ से
अक्सर
पँख बनाने की कोशिश
की है....

पता नहीं...
पत्ते की तरह
बस हवा में
उतर जाते हैं...

मैं चाहती हूँ...
यह उड़ें
तितलियों की तरह....
हवा मे अठखेलियाँ करते

कभी पंक्ति में...
बादल से उलझे....
खुले गगन में
चहकते विचरते....

उलट पुलट कर
कई बार
देखती हूँ
इरादे से
कई बार
उछालती हूँ....

कभी रंग
भरकर
कभी आकार
बदलकर
उड़ान के लिये
तैयार करती हूँ...

फिर भी....
पता नहीं...
पत्ते की तरह
बस हवा में
उतर जाते हैं...

आकार है
विस्तार है
पर
हवा से
हार जाते हैं

कुछ तो है
जो यह उड़ान भरते नहीं
तूफाँ में...
ज़रा देर भी
हवा में
ठहरते नहीं...


शायद....

नसें गुम हैं
यह फडफडाते नहीं
उड़ान के उमंग की
रवानी नहीं....
आत्मा की कोई
कहानी नहीं
यह कोई चिड़िया
सयानी नहीं....

फटे हुए पन्ने
कटे हुए पत्ते
पँख अकेले
चाहे जितना धकेलें
कहीं ऐसा तो नहीं
.........यह उड़ान नहीं .....

Sunday, March 16, 2008

मणिभ

गरम बात को
सँभल कर
शब्दों में उतार आये......

थोड़ी पुड़िया में
बँधी समझ
उसमें
चला आये

देखा...
ठंडा पड़ने पर
आकार में
ढ़ल गया है.....

शब्द से
शब्द के
बीच के मौन में
सार मिल गया है

लगता है
जम गई....
आज
बात...बन गई...

Saturday, March 15, 2008

सापेक्ष दृष्टि

तुम्हारे साथ साथ
चलती गई
मेरी एक गति थी
और तुम लगातार
साथ थे
मुझे लगा
वक्त थम गया है....
मेरी दुनिया
तुम्हारी आँखों में
जो रुकी थी
........
आज अचानक
ध्यान गया....

तो लगा...
हम कितनी
दूर निकल आये हैं.....


सापेक्ष- relative

Friday, March 14, 2008

पश्चात

जब से तू मिली है
नमक भी स्वादानुसार
पड़ने लगा है
.....
मेरे आँसुओं का
जायका भी
पहले से
बेहतर हुआ है...

Thursday, March 13, 2008

आलिंगन

सिरहाने पर
दिल रख कर
बाँह की गिरह में
बँध जाऊँ

धड़कन के खुरचने
पर सुलगूँ
लौ सी जलूँ
पिघल जाऊँ

तेरी कल्पना
स्वप्न सी मैं ढलूँ
बहकते बहकते
संभल जाऊँ

बेचैन अहसास के
शोर को
मूक सहमति में
दबा आऊँ....

गिरह की
सीमा के भीतर
अपना आसमाँ पकड़
छिपा आऊँ....

Wednesday, March 12, 2008

लहर

किसी ड़ोर से
बँधा नहीं है
किसी छोर से
खुला नहीं है
फिर भी...
हर हलचल
इस कण यहाँ
मचल पलपल
विकल वहाँ...

Tuesday, March 11, 2008

आज भी

बड़े दिनों बाद
फिर एक पुराने ख्याल से
मुलाकात हो गई
लगाव से
बड़े चाव से
मैं देखती रही
उसे सोचती रही
नहीं
बदला नहीं था...
वैसा ही था
................
जाते जाते
आज भी
घाव कर के गया

Monday, March 10, 2008

संयोग

बड़ी सी दुनिया के
छोटे से कोने में
धूल समेटती
रद्दी में पड़ी
एक पीले पुराने
पन्ने सी मिली....

खोये खजाने के
बक्से से गुम...
तहों में दबी...
कटे से किनारों में
खोई सी मिली....

मन के चित्र के
मानचित्र सी...
लक्ष्य की दिशा के
कम्पास सी
एक संदर्भ सी
संयोग सी मिली.....

..........................
ना जाने क्यों....
जब मिल गई
ऐसे लगा...
तलाश पूरी हुई......

Friday, March 07, 2008

तुलना

कितना चाहती हूँ....?!

रंगों की बाल्टी में
कूची डुबो कर
तेरे आसमाँ को
रंगों से भर दूँ....

तू सोया हो जब
तेरी पलकों में लाकर....
सपनों को
इरादों में बसा दूँ....

डगमगाया हुआ
तेरा विश्वास हो तब....
आस्था की पकड़ से
तुझको सँभालू...

जो बोझिल हो पल
तो अपनी हँसी से.....
हल्का इसे कर....
पँख लगाकर उड़ा दूँ....

तेरे बच्चों की अम्मा...
सौगातों की झोली..
तू चाहे तभी...
फरिश्तों को बुला लूँ.....

.........................

और तुम..
कितना चाहते हो....?!

रंग भरते हुए
जो यह हो जायें खाली....
इरादें जो तेरा
कहना ना माने
आस्था के भी
जब कदम लड़खड़ाये
तू हँसना अगर
कभी भूल जाये...

मैं तब भी तुझे....
इतना ही चाहूँ.....

मेरी रूह तुझसे
ऐसे जुड़ी है
हर रूप में ...
तू मेरी सखी है....

Thursday, March 06, 2008

त्रुटि

घड़ी की सूई देख
लम्हों का
हिसाब कर रहे हो....

उस दिन....
साँसों की
आवाजाही को
जिंदगी कह रहे थे....

साथ जो याद में
तब्दील हो रही है
ना जाने कैसे
मापोगे.....

आंकते समय
इकाई में हमेशा
भूल करते हो....

Tuesday, March 04, 2008

मेरे रंग में

कुछ मौन पल
कोरे कैनवास की तरह
थमा देते हो....

और मैं अपने शब्दों से
उनमें रंग भर देती हूँ.....

कभी कहते हो
मैने मन उतार दिया है....

तो कभी...
कि यही रंग
मन पर चढ़ा दे...

Monday, March 03, 2008

अमरबेल

उस दिन
टिकने दिया
आज तू फैला हुआ
विस्तार पर
अपना हक समझ
सोख कर
अपने पीलेपन को
लगातार
नम रखता हुआ...

जीवित ही था
सो कुचला नहीं...
जीने दिया....

नहीं तो...
कहाँ जड़े भी हैं
जो उखाड़ना पड़े....
बीन सकते हैं....

झटक दो अगर...
तो वजूद....
छीन सकते हैं.....

Sunday, March 02, 2008

बूंद

एक सामान्य से
दिन के पोखर पर
रुका एक पल था वह.....
ना जाने कब....
तैरते हुए...
उन सपनों की सतह पर
एक कतरा सा थम गया....

रौशनी से खेलते खेलते
लुढ़कते सरकते.......
ना जाने....क्या हुआ....

उड़ गया?!
या….
डूब गया…………