मोड़ पर हमेशा
गति धीमी
पड़ जाती है.....
हर बार
यहीं आकर
कुछ अटक सी
जाती है......
तजुर्बा भी
कहाँ रफ्तार बढ़ा
पाता है
यादों की स्मृति
घुटन सा जकड़
जाती है.....
............................
आज यादों से
कुछ दूरी
बनानी होगी....
रफ्ता रफ्ता
रफ्तार
बढ़ानी होगी
यह मोड़ ज़रा
जल्दी गुजर जाये
अगर.....
तो शायद
आसां
हो जायेगा.....सफर
भौतिक-विज्ञान में हमेशा रुचि रही है।
बैन्किंग एफेक्ट भी हमारे जीवन में प्रासंगिक है। मोड़ पर एक सीमा के आगे गति नहीं बढ़ाई जा सकती। अगर गति बढ़ानी हो तो रेडियस.....वृत्त की गोलाई ही बढ़ानी पड़ती है। केन्द्र का आकर्षण, मोड़ लेने वाली चीज़ का 'मास' और 'इनर्शिया', 'फ्रिक्शन'...यह सभी इस सीमा को निर्धारित करते हैं। सुजाता की टिप्पणी के बाद यह टीप जोड़ रही हूँ। कुछ आलस...कुछ यूँ ही...अपनी कवितायें समझाने की जहमत अक्सर नहीं उठाती। :))