Tuesday, April 29, 2008

पुन:


कंचे से कंचे पर
निशाना साधेंगे तो
क्या वह पल
जो समय की परत के नीचे
जमा है....
पिघल जायेगा....?!
फिर बुलबुला बन...
दो क्षण के लिये ही सही
ठहल पायेगा...
वो गुलाबी नीले से होकर
गुजर जायेगा...
........
बस एक बार फिर
इन कंचों में
क्या इंद्रधनुष
साँस ले ...
सुकून से सो पायेगा....?!!

Monday, April 28, 2008

फसल


बड़ी उमंगों से बोया था
वह ख्वाब का बीज
नमी वहाँ थी...
ज़मीं वहाँ थी
पड़े उजाले कम....


विचारो की शाखा में
एक झरोखा बना दो....
उजालों को उतारो
ज़मी पर फिर चला दो....
कहीं कोई नया अंकुर
कोई कोंपल जगा दो...
हाथ को हाथ में थाम
थोड़ी ज़मी लगा लो
गिरह बना ....
.. एक जंगल उगा लो....

उजालों को आ जाने दो
ख्वाबों को फिर लगा लो...

Saturday, April 19, 2008

निवेदन

कल्पना के पृष्ठ में
कैद कर
किताब बंद कर
हाथ में पकड़ ली....!!

ज़रा वही पन्ना खोलकर
आज़ाद करो...

यथार्थ में
जाने का वक्त
हुआ जा रहा है...

Wednesday, April 16, 2008

नि:शब्द

कई बार
मौन को
अपने शब्दों के बीच रख
उक्ति में
अर्थ भरा है.....

आज आकुल मौन के
अनुवाद के लिये
अक्षर अपरित्याज्य है....

इनकी खामोशी में...
अभीष्ट अर्थ
लुप्त हो रहे हैं....

Tuesday, April 15, 2008

शाश्वत

आरंभ से अंत के
निरंतर से अनंत के बीच
एक निरंकुश पल
की तलाश....

जो चरम पर
परम तक
होकर भी...
भूत और भविष्य से
निरपेक्ष हो

एक परिशुद्ध,
सुनिश्चित्त
दृढ़ पल
जिसमें निरीह,
निर्दोष अनुभव....
आज भी ....
संभव हो.....

Sunday, April 13, 2008

पहचान


धूप ने छुआ
तो शाख से
छाँव गिर गई....

छिपे हुए साये
रौशनी में
साफ दिख गये....

सहमी हुई कालिमा...
धूप में
शीतल लगी.....

तेरे साथ ही
तेरे साये भी
आज मिल लिये.....

इस तरह यह
छू गये....
नेह से आँख भर गई......

पहचान कर
फिर एक बार
रूह से रूह बँध गई

Wednesday, April 09, 2008

हासिल

अँजली में धूप मिली
थोड़ी हवा में
सिली सिली
अपना बनाने को
मुट्ठी ना बाँधों...
कहीं शिथिल ना हो जायें...
इसकी पँखुड़ियाँ
खिली खिली.........

..........
रौशन करो रूह....
थोड़ा तपो.....
तप से .....सूरज
मन में धरो.......
इस तरह धूप को
अपना करो....
सच यह अपना
सपना करो.....

Tuesday, April 08, 2008

रात भर


पूरी रात खींच कर
बाँध दो.....
आधी रात को
उसके बाद लो....
थोड़ी ओढ़ लो
थोड़ी बाँट लो
थोड़ी बच गई...
सोचो क्या करो

इस करवट को
तुम रखो.....
उस तरफ की
मुझको दो....
पलक में सपना
पाल कर
थोड़े चाँद सितारे
उतार लो

प्यार से फिर प्यार को
स्पर्श से छू सको
बीच में यह पल सके...
रूह से थोड़ा नूर दो.....
थोड़ी लाज में
जो डूबी तो
थोड़ा नाज से....
उभार लो.....

साथ को साज को
रूप दो...सार दो.....

बाँधी हुई रात को...
आसमाँ से उतार दो
प्यार को निखार कर....
सुबह फिर संसार दो......

Monday, April 07, 2008

चयन

जिन्दगी थोड़ी जल्दी में
लगती है....

मेरे सामने
लम्हा लम्हा
ख्यालों का ढ़ेर
लगा देती है....
उसे जज़्बात
के अलग अलग मुखौटे
पहना देती है.....
और फिर
मुँह चिढ़ा कर कहती है....
चुनो.....

हिचकिचाते हुए....
जज़्बों को
नज़रअंदाज़ कर
ख्याल चुन आती हूं.....

थोड़ा डरती हूँ...
क्योंकि
ज़रा देर में
मैं वही
ख्याल बन जाती हूँ......

Sunday, April 06, 2008

रूपान्तर

सोचती हूँ
किस तरह
नमी जो मिली
जड़ो से सोंक
अपनी धमनियों में
दौड़ा कर
लाल रंग बना....
फूल पर चड़ा दूँ....

हर रोज़ कहाँ
आँसू मिलते हैं.....!!

Saturday, April 05, 2008

इल्यूशन्स

जैसे कोई
सपना हो जीवन
झाँकियाँ
बदलती हुई
पल पल....

किसी कसी हुई रस्सी पर
चलते हुए
हाथ में लठ.....
और फिर
फिसल सँभल......
डर लगता है...
और बुदबुदाते हुए
होठों को
छू जाता है
माँ का आँचल

सँभल जाता है मन
फिर एक बार नींद में....

पर हर बार नहीं....
कभी पाँव फिसल....
बहुत ऊँचाई से
गिरता है....
माँ नहीं सुनती.....
नींद नहीं खुलती....
पास बैठकर
हँसते हुए
कोई नहीं पूछता....
सपना देख रही थी....?!


गिर कर खाई चोट का
अँदाज़ा लगाने से पहले
फिर बदल जाता है दृष्य

नई झाँकियाँ
हँसती हुई
भागती हुई
कुछ जबरन
मुस्कुराती हुई.....

होती है
गुदगुदी सी...
किलकिलाते हुए
बदल लेती हूँ
करवट
फिर एक बार......

कच्ची सी नींद
सपनों की कतार....
लगता है
बस अब छोर
और फिर
जाग जाऊँ.....

पर कहाँ...
टूटती नींद में से
फिर उभरता है सपना कोई....
फिर गोते
फिर डुबकी.....

ना जाने
कितनी बार.....
और....
ना जाने
कितनी देर....
और..........

Friday, April 04, 2008

रीफिल

मन की थाह
ढूँढ़ने ...
हर रोज़
शब्दाँजली में
भाव भर भर
निकाल आती हूँ....

....और फिर फिर
इसे भरा पाती हूँ....
...................
अगर कल
पकड़ नहीं आते तुम....
तो मुझे लगता
यह कोई जादू है....!!

Thursday, April 03, 2008

हठ


देखा आसमाँ को...
यूँ लग रहा है मानो
सुस्ताये हाथों से
सफेदी में कूची डुबो कर
बादल को फैला दिया हो....
.....
माने नहीं तुम.....
खुदा को पूरी रात
दुआ माँग
उलझाये रखा!!

Wednesday, April 02, 2008

वक्त वक्त की बात

मुझे यकीं है की
वक्त की रफ्तार
बदलती है....

नहीं तो तुम्ही बताओ...
कुछ पड़ाव से जल्दी...
कुछ पर क्यों
रुक रुक गुजरता है...??

कहते हैं..
वक्त लौट कर आता नहीं....

फिर तुम्हारी आँखों में
वही शाम क्यों बार बार
दिखती है.....??



हमने तो...

वक्त को अक्सर...
वक्त से जूझते देखा......
घुटनों पर...
मोहलत की
दुआ माँगते देखा.....
सालों को ..
चुटकी में गुजरते देखा...
लम्हों में युगों को
सिमटते देखा

ना जाने किसने
अफवायें यह
फैलाई हैं........

हमने तो...
हमेशा इसे .....
पीछे मुड़कर आते देखा.....

हाँ यह बात और है...

लौटकर वह हमेशा
खामोश रहा है........

नहीं तो
इसकी बोलती आँखों को
हमेशा नम देखा.....