
तुम्हारे पास अँधेरे का
एक छोटा सा टुकड़ा था
और मेरे हाथ में एक टॉर्च....
हमारे बीच
थोड़ी सी रौशनी का
रिश्ता था.....
साथ में रह कर
तुम खुद को उजालों में
पहचानना चाहते थे
और मैं किसी छिपे खजाने के
मिलने की खुशी में
बेसुध हो निहार रही थी...
खजाना अनमोल था
तुम भी...
मेरे पहचानने भर से
कोई अधिकार तो नहीं बना था
पूरे उजाले में तुम्हे देख
ना जाने क्यों.......
मैं अँधेरे के उस टुकड़े को ढूँढ रही थी
जिससे रौशनी का यह रिश्ता बना था













