Wednesday, May 28, 2008

अँधेरों की रौशनी


तुम्हारे पास अँधेरे का
एक छोटा सा टुकड़ा था
और मेरे हाथ में एक टॉर्च....

हमारे बीच
थोड़ी सी रौशनी का
रिश्ता था.....
साथ में रह कर
तुम खुद को उजालों में
पहचानना चाहते थे
और मैं किसी छिपे खजाने के
मिलने की खुशी में
बेसुध हो निहार रही थी...
खजाना अनमोल था
तुम भी...
मेरे पहचानने भर से
कोई अधिकार तो नहीं बना था

पूरे उजाले में तुम्हे देख
ना जाने क्यों.......
मैं अँधेरे के उस टुकड़े को ढूँढ रही थी
जिससे रौशनी का यह रिश्ता बना था

Monday, May 26, 2008

जग्गलर


लाल थी , भूरी थी
वो गेंद थोड़ी भारी थी
सयानी थी, पुरानी थी
वो मिट्टी से सनी थी
उछालो तो
कहाँ उछलती थी
वह जड़ो से उलझ
अटकती थी

एक गेंद हरी भरी थी
हाथों में आ कर ठहरी थी
आधी कच्ची थोड़ी पकी थी
चल उछल थोड़ी थकी थी
कभी ऊपर कभी नीचे
हमेशा कुछ तकती थी
चलती थी फिसलती थी
फिर भी कहाँ रुकती थी


एक और थी, आसमानी थी
धुँए सी थी, रूमानी थी
सपनो की वह सगी सी थी
अपनों पर उगी सी थी
उड़ान सी वो भरती थी
चढ़ान पर कभी रुकती थी
क्षितिज पर वह ठहलती थी
तितलियों सी थिरकती थी

झोली में तीन गेंदों को रख
चाहूँ हाथों में तीनो हो
छलिया सा कोई जादू हो
उछालूँ एक सँभालूँ दो
भूत भविष्य और वर्तमान को
सब साथ साथ जी जाऊँ मैं...

Sunday, May 25, 2008

शब्दों के परे


कुछ कविताओं को
मेरी कलम छू नहीं पाती
यूँ लगता है
जैसे वो
शब्दों और उनके अर्थ में
बँधना नहीं चाहती
उनमुक्त प्रवाह में
चलते हुए
सीमाओं में
थमना नहीं चाहती
..........
ऐसा नहीं है की
कभी कोशिश नहीं की
पर सबसे खूबसूरत कविता को
मेरी कलम
व्यक्त करना नहीं जानती....

शायद...
रूह की महक
किसी इत्र की बोतल में ठहरना
नहीं चाहती....

Monday, May 19, 2008

विलय


रौशनी जिस जगह
छू कर लौट गई
लगा मेरे अस्तित्व
की सीमा है.....

जब तेरे
आँखों की चमक
उजालों सी
मेरी रूह में उतरी
तो जाना
कोई अलग
अस्तित्व ही नहीं.....

Monday, May 12, 2008

नोक झोंक


चाहे चाँद आँखो में
बिठाकर
ज़रा मुस्कुराकर
दे दो ...देखो ...
मैं नहीं मानूँगी.....

चाहे लहरें गिना दो
उसमें से थोड़ी सी
लाली उठाकर
लगा दो
मैं नहीं मानूँगी.....

गाल पर गिरती
गीली नमी
नमकीन से
मीठा बना दो
मैं नहीं मानूँगी.....

थाम कर हाथ मेरा
नापसंद सारी
लकीरें मिठा दो
मैं नहीं मानूँगी.....

मनाते मनाते
अगर रूठ जाओ...
हँसाते हँसाते
अगर रो पड़ो तो....
सोचूँगी....
....शायद....
मैं नहीं मानूँगी.....
.............................



मनाया नहीं
और आँखों में चँदा
बिठाया नहीं
लहरों को लेकर
भिगोया नही
हाथ को थाम कर
लकीरे मिलाई नहीं
मेरे साथ में गर
हँसे तुम नहीं
रोते हुए
आँख नम ना हुई....

तो फिर....
................
सच में
रूठ जाऊँगी मैं.....

Sunday, May 11, 2008

विश्वास


जब भी तूफान आता है
वह पेड़ सिहर उठता है
उसे मालूम है
कि उसकी जड़ें
कितनी अंदर हैं...



बरगद नहीं गुजरा
कभी ऐसे डर से
क्योंकि
टहनियों से भी
जड़े उसने
टाँगी है..
...

ऐसा भी तूफान है
जब बरगद भी
उखड़ जाता है....
पर डरने से
वो तूफान
कहाँ थम पाता है....


गिरते गिरते..
...गिरे हुए
बरगद की...
उखड़ी हुई
इन साँसों में
विश्वास अमर
हो जाता है....

Saturday, May 10, 2008

विकल्प


हमेशा जिन्दगी
दाँव देकर
दुराहे पर मिलती है
और मुँह चिढ़ा कर
पूछती है
यह मुट्ठी कि यह
कभी एक में
मीठा झूठ
दूसरे में
कड़वा सच
एक में रूह की मंजिल
दूसरे में घर का पता
कभी अपनों से वफा
खुद से छल
कभी एक में सपना
और दूसरे में कर्तव्य
........
बंद मुट्ठी को देखकर
मेरा असमंजस जानकर
मुट्ठी खोलकर
पूछती है...
बताओ अब....
यह मुट्ठी कि यह

और मैं सोचती हूँ
जिंदगी के सवाल
हमेशा
इतने जटिल क्यों होते हैं.....?!

जीत कर भी हारा सा
अहसास
और हार कर भी
जीत का बिगुल....

जिंदगी क्यों कभी
मुट्ठी की
लकीरों में नहीं
थमती है.....?!

Thursday, May 08, 2008

आश्रय


तरंगों पर झूला
झूलकर भूलकर
नींद में खो जाने का
मन है.....

माँ तेरी गोद में
अँगडाइयाँ उतार कर
सो जाने का
मन है....

सहलाती उँगलियों से
जादू जो उतरे... उसमें
खो जाने का
मन है.....

तेरे आँचल में आ कर
हर चोट को...दर्द को
भूल जाने का
मन है.....

सहम कर जो सपने में उठूँ
जब कभी भी
तेरी खुशबू पकड़ सो जाने का
मन है...

तुझ में ही लौटकर
फिर एक बार..
अपनी पहचान पाने का
मन है....

तेरे स्नेह की छाँव में
खुद में सिमट कर सँभल कर
...जाग जाने का
मन है

Wednesday, May 07, 2008

आंसू


मैने देखा है
ओस की बूंद को
धूप में
सूख कर
हवा में उठते हुए
उड़ते हुए
जिद में अपनी
रुकते हुए
बादलों में ठहरते हुए
श्वेत से श्याम में
ढ़लकर
उजालों के आगे
धब्बे से लगते हुए
कतारों मे और भी
बूंदो को पीछे लगते हुए....
......
अपने ही भार से
लड़खड़ा कर
गिरते हुए....
बरसते हुए
फिर से बूँद बनते हुए.....
...................
उजालों को नहा कर
निकलते हुए
मुस्कुरा कर
इन्ही
बूँदों की गोद में
पसरते हुए

Monday, May 05, 2008

संकेत


वहीं था...
.....खामोश....
उसका होना
वहाँ की हवा को पता था

शायद किसी स्पर्श से जाग जाता
कोई साँस की फूँक से
साँस लेता
पोर को थाम
उठकर गाने लगता
हथेली के नीचे
उछल कूद करके
शोर को भी
वह लय में सुनाता...

संगीत था तो वहीं बस
शायद समय की
प्रतीक्षा उसे थी
जो छूकर उसे दे....
बोलने का इशारा
ब्रम्हाण्ड में स्वर
घोलने का इशारा...

Friday, May 02, 2008

तृष्णा


रात तो बीत गई....
और वो धूप को
बंद आँखों के भीतर से देख
बार बार
आँख मल
जगने की कोशिश करता है...
..........................
सुलगी हुई धूप
सूखी उँगलियों से
झकझोर कर
फिर जगा देती हैं
एक प्यास


होंठ पर जीभ फेर
सूखी हवा को चख
एक बार फिर तरस
नीम बेहोशी ओढ़
अपने में ही सिंकुड़
सो जाता है
.........
वो अंकुर...
प्रस्फुटित होने से पहले
.....फिर से
बीज में