Friday, October 31, 2008

अहसास
















सुनाई देती है
खाली कमरे में
घड़ी की टिक टिक की तरह
दिखे ऐसे
पर्दे के पीछे
हवा हो जैसे
उसकी आवाज़ का भी
एक जायका
अलग सा है
जैसे कढ़ी पत्ते का
छौंक लगाया हो
छू तो सकते हैं
पर हाथ कभी आती नही
नज़र भर देखना हो तो
आँख मूँदनी पड़ती है

कैद कैसे ऐसी
अदा को करें
.........
उसकी शोखियों को
बस महसूस
किया करते हैं...

Sunday, October 26, 2008

संपूर्ण










दिनभर
जूझता है
उसका अस्तित्व
ठोस और साये के बीच
.....
छोटे और लँबे
सायों में
बँटते बिखरते
अहसास होता है
उसे अपने अधूरेपन का
....

दो आँखों की
गहराईयों में
ढूँढ़ता है वो
अपने बाकी हिस्से
.........

आधी रात को
अलसायी नींद में
करवट को करवट पर रख
अनायास ही...
पा लेता है अपने
समूचेपन को

Friday, October 24, 2008

साथ












हम एक दूसरे के
कितने आदी हो चुके हैं
तुम्हारा अचानक से आ जाना भी
सामान्य सा लगता है
घर में हर दीवार पर
सोफे पर, फर्श पर
तुम मिल जाते हो
जैसे खुद को थोड़ा बहुत
उतार कर जाते हो
मेरे श्रंगार पर
अब घ्यान नहीं जाता तुम्हारा
सीधा आँखों में झाँकते हो
फैला हुआ काजल देख
ठिठकते ज़रूर हो
जैसे आँसुओं की गहराई नाप रहे हो
फिर मुस्कुरा कर
...नहीं तो झुँझलाकर
आगे बढ़ जाते हो
सोचती हूँ
आखिरी बार फूल कब दिया था...
कोई हार....हीरा
हाँ जुकाम के समय
अधरक वाली चाय ज़रूर याद है
और ऑफिस के पास लगे पेड़ से
तोड़े हुए बेर
जो वॉचमैन को बता कर लाये थे
अपने अधिकार तुम्हे कभी भूलते नहीं
मेरे हर सही गलत फैसलों से उलझ जाते हो
कभी लगता है
बहुत अजीब हो
मेरी हार में
मेरे सबसे करीब होते हो तुम

.........
मुझे तुम्हारे होने का अहसास नहीं
सुकून से ली गई साँसों की लय सी
नि:शब्दता है इसमें....

Monday, October 20, 2008

रूठी उलझन













वो ख्याल
जिस्म पहन कर
रास्ते पर
दिन रोक लेता है...
उठते कदम के ठीक सामने
हठ करते
किसी रूठे बच्चे की तरह
जो करीब जाने पर
खुद में ही सिंकुड़ जाता है
और नज़र हटाने पर
रुआँसा हो जाता है
मन तो होता है
आँचल मे भर लूँ लाड़ से
पर छूने की कोशिश भर से ही
वो जिस्म छोड़ देता है....
रहता है तो बस
एक खाली अहसास
अधूरा सा
जो होता तो है...
पर फिर उलझता नहीं...

Saturday, October 18, 2008

तृष्णा














उमड़ते घुमड़ते
बदली
उन आँखों में
बिखर सिमट रही थी
जैसे तलाशती हो
वो सूखा दामन
जहाँ
बरसात को तरसी
एक सूखी ज़मीं हो....
......

उगने को
एक जंगल खड़ा हो
बस ज़रा सी
..........
नमी की कमी हो

Tuesday, October 14, 2008

पानी पर











ठहरे हुए मन में
गिरता है
कोई संदर्भ
और उस हलचल में
होती है
उथलपथल
हवा में गिरा कोई पत्ता
किसी मासूम बच्चे के हाथ से
छूटा कोई कंकड़
कभी मन की थाह लेने की कोशिश में
गहरे उतरता कोई पत्थर
कोई धारा को पाटने की साजिश
कोई किनारे पर
अंकुरित होते
नन्हे पौधे...उनके हल्के हिलते कोंपल
पेड़ से गिरा कोई तैरता फल
कल से ठकराता कोई स्वर
कलकल...
तरंगों सी
सजती है कोई कविता
हर नये संदर्भ में
नई पोशाक पहन थिरकता है मन
कभी हौले से
फैलती है...
कभी सिमटती है....
संवरती है...
कभी
बिखरती है .....
......
पानी से सतह पर
ऐसे ही उभरती है...
कोई कविता

Sunday, October 12, 2008

जिद








बड़ी भोली सी जिद थी
वक्त से थोड़ा ठहरने की
भरी बदली सी थी वो
बरसने से पहले
आसमाँ की आगोश में
दो पल और
ठहरना चाहती थी....
.........
बदलते वक्त में..
कहाँ जिद पूरी कोई करता है
लाड़ आता भी है तो भी
उँगली छुड़ा कर
बदली को बरसा देता है.....

Thursday, October 09, 2008

व्यय












कोई जज़्बा
कोई बात
जकड़ लेती है..
अंतस्थ: को
झकझोरती
क्षोभ की,
उत्तेजना की
चिंगारी
आग पकड़ती है
धधकता है
मन का अंतरंग...

कुलबुलाते हुए
जज्बे
फूट पड़ते हैं
किसी ज्वालामुखी की तरह
किसी भावुक
आवेश भरी
कविता की तरह
आती है ऐसे क्रांति
होता है शोर
विप्लव, विद्रोह...

....
ऐसा भी होता है
लोग दफना देते हैं
ऐसी आग
बहुत भीतर
सतह पर
सबकुछ सामान्य लगता है
पर फिर भी
बुझती नहीं है
ऐसी आग
और करती है भस्म
हर आंतरिक
निर्माण को...
धीरे...
पर निश्चय ही
खाक हो जाता है
अंतस्थ:....
बदल जाता है
इंसान...
बेमानी हो जाती है
वो बात.....
वो जज़्बा....

Sunday, October 05, 2008

एक पत्ता छूटा सा














काल की ड़ाल से
गिरा कोई
लम्हा हूँ मैं
हौले से
ड़ोलता
भ्रम में अपने
पर खोलता
पहर पहर
लहर लहर
बहार में
बौछार में
अभिप्राय बन
अफवाह बन
माया कभी
साया कभी
रास्तों में
ख्वाब हैं
शाप हैं
और पाप हैं
कभी स्याह रास्ते
उलझे हुए कुछ वास्ते
बदलती सी गति है
अभी तेज है
फिर रुकी रुकी
छूटा हूँ मैं
टूटा हूँ मैं
ना जड़े हैं
ना अंकुर हैं
कई नाम है
पहचान है...
कुछ खास हैं
कुछ आम हैं...
मेरी गति मेरी नहीं
मेरे रास्ते यह कौन से
हवा ही साँस ले रही
मेरे गुजरते जिस्म में
मैं तो बस बाँसुरी
जो बज रहा
वह काल है
.....
काल की ड़ाल से
गिरा कोई
लम्हा हूँ मैं

Wednesday, October 01, 2008

मुझे कुछ नहीं कहना














कैसे उतारूँ शब्दों में
सोते हुए शिशु के होंठों पर आये
मासूम से स्मित सी
कोई निर्दोष सी बात....

या ऐसी बारिश
जो बंद कमरे की
खिड़की को खोल
हवा का सिरा पकड़
अंदर चली आई हो...

उस भ्रम को
जो बहुत ताकने पर
टूटे तारे की तरह
उम्मीद की लकीर सी
खिंच आई हो...

ऐसे अपराध को
जिसे मौन
लगातार करता रहा हो
और फिर भी
हर दलील से परे हो

कैसे उतारूँ शब्दों में
भीगी आत्मा की
भीनी सी खुशबू....
उसकी ऊर्जा
उसकी तपिश....

मुझे कुछ नहीं कहना....

अनुभूतियाँ
अभिव्यक्ति की
मोहताज नहीं.....
अभिव्यक्ति
अनुभूतियों सी
ईमानदार नहीं....








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