
हम एक दूसरे के
कितने आदी हो चुके हैं
तुम्हारा अचानक से आ जाना भी
सामान्य सा लगता है
घर में हर दीवार पर
सोफे पर, फर्श पर
तुम मिल जाते हो
जैसे खुद को थोड़ा बहुत
उतार कर जाते हो
मेरे श्रंगार पर
अब घ्यान नहीं जाता तुम्हारा
सीधा आँखों में झाँकते हो
फैला हुआ काजल देख
ठिठकते ज़रूर हो
जैसे आँसुओं की गहराई नाप रहे हो
फिर मुस्कुरा कर
...नहीं तो झुँझलाकर
आगे बढ़ जाते हो
सोचती हूँ
आखिरी बार फूल कब दिया था...
कोई हार....हीरा
हाँ जुकाम के समय
अधरक वाली चाय ज़रूर याद है
और ऑफिस के पास लगे पेड़ से
तोड़े हुए बेर
जो वॉचमैन को बता कर लाये थे
अपने अधिकार तुम्हे कभी भूलते नहीं
मेरे हर सही गलत फैसलों से उलझ जाते हो
कभी लगता है
बहुत अजीब हो
मेरी हार में
मेरे सबसे करीब होते हो तुम
.........
मुझे तुम्हारे होने का अहसास नहीं
सुकून से ली गई साँसों की लय सी
नि:शब्दता है इसमें....