Wednesday, December 31, 2008

चाह











सुनहरी गुलाबी घटा दे दो
समंदर की नमकीं हवा दे दो
थोड़ी अलग सी ज़मीं दे दो
एक टुकड़ा नया आसमाँ दे दो

जाने पहचाने आगोश में
शरारत कोई नयी दे दो
आँखो की चमक में आज
पहचान थोड़ी बदल दे दो

मेरे हाथों की लकीरों में
मकसद कुछ और हसीं दे दो
साथ मेरे चल कर के
रास्तों को मंजिल दे दो

गुलाबी मैं सुनहरे तुम
चलो सूरज डुबा आओ
सोने सी सुलग जाऊँ
बरस तुम जिंदगी दे दो...

Wednesday, December 17, 2008

पहुँच













मुझे यकीन है
मेरे मन में खिला
हर भाव
तुम तक पहुँच जाता है
मैने देखा है
इम्हे तुम्हारी आँखों में
अंकुरित होते हुए....

......
तभी तो
मेरे खिल कर
बिखरते ही
तुम्हारी आगोश में
मिल जाती है
मुझे मेरी ज़मीं....
मेरा आसमाँ

Wednesday, December 03, 2008

परिकलन












सभी खिड़कियों से
आसमाँ के पर्दे
उतार लो....
आज खुले में
आसमाँ नाप आयें..

बहुत हुआ
नाप का गलत माप आंकना....
ज़रा साथ में
विस्तार का
अनुमान भाँप आयें