Monday, January 05, 2009

प्रबल













तूफाँ में बुझती भी है...
धधकती भी है
आग.....
......
जलते रहने की
कशिश
कितनी है...
हवा में
परखती है आग.....

6 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

बहुत खूब!

विनय said...

बहुत ख़ूब बड़ी गहरी अनुभूति ज़ाहिर की है



---यदि समय हो तो पधारें---
चाँद, बादल और शाम पर आपका स्वागत है|

Udan Tashtari said...

वाह!!

बेहतरीन!

कंचन सिंह चौहान said...

bahut khoob...!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर!

अनूप भार्गव said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है ।
कन्हैया लाल नन्दन जी की एक कविता याद आ गई जो उन से ’विश्व हिन्दी सम्मेलन में सुनी थी’

आग भी कभी कभी आपत धर्म निभाती है
जलने वाले की क्षमता देख कर ज़लाती है ।

पूरी कविता यहां सुनी जा सकती है :
http://www.youtube.com/watch?v=Wx8IlgqaArc