Friday, January 09, 2009

देने को तो...












देने को तो दे सकते थे....

सात रंग पहनाकर
कोई किरण
मन में फुदकता
कोई हिरण
दवा सी नज़र
दुआ सा असर
खट्टी मीठी चटपटी
इमली सी हँसी
कोई बात पुरानी
रंगों में भीगी फँसी
कच्चे अमरूद का
चोरी का स्वाद
खुद ही सँभाली छिपाई
कोई याद
साथ बैठकर पी कोई चाय सी
ताज़ी नज़र
रसीली,रसभरी छुअन सा
कोई असर....

देने को तो दे सकते थे....
खुशबू से भरी
थोड़ी पवन
मुस्कुराहट भरा
कोई चमन
बिछड़े हुए
रास्तों की खबर
दोस्त पुराने...
सबर का हुनर....

कहते हो मुझे
जान हाज़िर है मेरे लिए...

बताओ....
दी हुई चीज़ भी कोई बार बार देता है भला....

9 comments:

Vidhu said...

बेजी जी,तुम्हारे मन के भावों के हर शब्द..मूंगे-मोती-हीरे -पन्ने जैसे...इसे समझने के लिए इन्ही मैं से होकर गुजरना..बिछड़े हुए रास्तों की खबरदोस्त पुराने...सबर का हुनर....कहते हो मुझेजान हाज़िर है मेरे लिए...बताओ....दी हुई चीज़ भी कोई बार बार देता है भला.... सच नही ना ऐसा भी भला कहाँ होता है ..सुबह इतनी अच्छी चीजें पढने के बाद क्या कहूं

anuradha srivastav said...

दी हुई चीज़ भी कोई बार बार देता है भला.........
बहुत खूब

विनय said...

आपसे कभी संवाद नहीं हुआ लेकिन आपकी रचना पढ़ने के बाद यह शिक़ायत भूल ही जाता हूँ

---मेरा पृष्ठ
चाँद, बादल और शाम

Udan Tashtari said...

बहुत खूब..बेहतरीन!!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

जान जो दे दी है एक बार,
कहाँ से लाऊँ बार बार?

बहुत खूब सलीके से कहा है आपने।

shelley said...

बताओ....
दी हुई चीज़ भी कोई बार बार देता है भला
achchi kavita hai.

mehek said...

aatkhat chulbuli si rachana aur antim line jabardast,sundar,bahut hisundar.

कंचन सिंह चौहान said...

iatane sundar khayaal kahan se aate hai aap ke paas....!

kuchh kahane ko nahi rah jaata

मीत said...

Great Beji. Too good.