
सड़क पार करते हुए
हाथ पकड़ा था
जैसे अचानक से मेरा
उस दिन का लड़खड़ा कर
गिर जाना याद आया हो....
फिर चाट की दुकान पर
रुक कर पूछा था
गोल गप्पे खायेगी...
मेरे सर हिलाने पर
फिर हाथ पकड़ कर
आगे बढ़ गये
मैं देख रही थी
तुम्हारा रुक रुक कर चलना
जैसे मेरे चेहरे पर उठते हुए
अपेक्षाओं के जवाब
किसी कुंजी में ढूँढ़ रहे हो...
अपेक्षाओं से हमेशा
घबरा जाते हो तुम
अपनी सोच की गहराईयों
में उतर कर
सोचते हो क्या चाहती हूँ मैं....
मैं हताश होती हूँ...
और फिर मुझे देख तुम भी...
बताओ..
आँख की सतह पर तैरता ख्वाब
देखने के लिए
इतना गहरा क्यूँ उतरते हो...?!!!




8 comments:
वाह !!!!
आँख की सतह पर तैरता ख्वाब
देखने के लिए
इतना गहरा क्यूँ उतरते हो...?!!!
खूबसूरत !
आपकी यह कविता बहुत ही अच्छी है। क्या आप इन कविताओं को पत्रिकाओं में प्रकाशित कराना चाहती हैं। यदि हां तो कृपया मेर ब्लांग पर आए। उसपर बहुत सी अच्छीसाहित्यिक पत्रिकाओं की जानकारी है। please visit us at
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आप की यही एक कविता अच्छी नहीं, सभी स्तरीय हैं। पूरे संग्रह के प्रकाशन की जरूरत है।
सदा की तरह सुन्दर !
घुघूती बासूती
भावनाओं को शब्दों का सहारा लेकर कविता बना दिया आपने....बहुत खूब
कविता पसंद आई !
आँख की सतह पर तैरता ख्वाब
देखने के लिए
इतना गहरा क्यूँ उतरते हो.
क्योंकि बहुत बार लगता होगा कि इन तिरते ख़्वाबों के पीछे भी बहुत कुछ होगा जो छूट गया होगा
खूबसूरत कविता
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