Wednesday, January 21, 2009

तेरे बिन













झूठी आधी अधूरी ख्वाईशें
सिरहाने रखी हैं...
बड़ी मीठी हैं ये...
सच मैने चखी हैं...

ज़रा स्वाद लोगे
तो ऐसा लगेगा
जैसे नारीयल की मीठी
शराब हो....

थोड़ा नशा है
थोड़ी प्यास भरी है
जब यह घुलेंगी
तुम्हारी नींद उड़ेगी

अधूरी सी बातें
आधी रात में....
कटे चाँद में आ
बेकरार करेंगी....

........
हैरान हो...?!!
........
तुम्हे क्या लगा
अकेले यूँ ही....
नींद आ जायेगी?!!

10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सच भी और रूमानी?

Manoshi said...

nice!

Udan Tashtari said...

तुम्हे क्या लगा
अकेले यूँ ही....
नींद आ जायेगी?!!

गजब!! बहुत खूब!

विनय said...

हम तो मदहोश हो रहे हैं... हम्म्म्म

---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

कंचन सिंह चौहान said...

:) :) :)

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर ।

सुशील कुमार छौक्कर said...

झूठी आधी अधूरी ख्वाईशें
सिरहाने रखी हैं...
बड़ी मीठी हैं ये...
सच मैने चखी हैं...

सच मीठी सी है। अद्भुत।

राधिका बुधकर said...

वाह वाह .........

Parul said...

waah..beji

मीत said...

Beautiful. Beji.