
कभी जादू की तरह
अकेले रास्तों में
आँख मल कर
उठते हैं नन्हे कोंपल
बेमौसम, बेवजह,बेशर्त
ज़रा सी नमी से
बसंत सजा जाते हैं....
मोड़ हसीं हो जाते हैं...
और रास्ते
फिर से...
मंजिल की खोज में
बदल जाते हैं...
POEMS IN HINDI moments....thoughts....emotions....analysis..... descriptions...reflections....expressions....impressions.....my words....my feelings
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12 comments:
बेमौसम, बेवजह,बेशर्त ..सच यही तो वास्तव मैं जीना है. बहुत सुंदर रचना
एक बार फिर से बहुत उम्दा लिखा है।
अच्छी रचना है.
बहुत सुंदर लगी कविता.
और यूँ ही कुछ आवारा शब्द जीवन के किसी सपाट दिन में वसंत का जंगल उगा जाते है.
बधाई .सुंदर रचना.
Waah ! Bahut sundar bhavabhivyakti.
हर मोड़ पर मंजिल की खोज में रास्ता बदल जाता है
शायद मंजिलें भी बदल जाती होंगी
bahut sundar
सीमित शब्दों में असरधार ढ़ग से कहना कविता की विशेषता है उसी कौशल का पता आपकी कविताओं से लगता है। बहुत ही सुंदर कविताएं हैं।
bahut hi aachi rachna hai...
बहुत सुन्दर और मनमोहक रचना!
गुलाबी कोंपलें
मेहंदी हसन की गाय़ी गजल का शेर याद आया.....
कोंपलें फिर फूट आयी हैं, कहना उसे....
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