Monday, February 02, 2009

जंगली फूल




















कभी जादू की तरह
अकेले रास्तों में
आँख मल कर
उठते हैं नन्हे कोंपल
बेमौसम, बेवजह,बेशर्त
ज़रा सी नमी से
बसंत सजा जाते हैं....

मोड़ हसीं हो जाते हैं...
और रास्ते
फिर से...
मंजिल की खोज में
बदल जाते हैं...

12 comments:

Poonam said...

बेमौसम, बेवजह,बेशर्त ..सच यही तो वास्तव मैं जीना है. बहुत सुंदर रचना

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक बार फिर से बहुत उम्दा लिखा है।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अच्छी रचना है.

Pratap said...

बहुत सुंदर लगी कविता.

sanjay vyas said...

और यूँ ही कुछ आवारा शब्द जीवन के किसी सपाट दिन में वसंत का जंगल उगा जाते है.
बधाई .सुंदर रचना.

रंजना said...

Waah ! Bahut sundar bhavabhivyakti.

निशा said...

हर मोड़ पर मंजिल की खोज में रास्ता बदल जाता है
शायद मंजिलें भी बदल जाती होंगी

mehek said...

bahut sundar

saraswatlok said...

सीमित शब्दों में असरधार ढ़ग से कहना कविता की विशेषता है उसी कौशल का पता आपकी कविताओं से लगता है। बहुत ही सुंदर कविताएं हैं।

chopal said...

bahut hi aachi rachna hai...

विनय said...

बहुत सुन्दर और मनमोहक रचना!

गुलाबी कोंपलें

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मेहंदी हसन की गाय़ी गजल का शेर याद आया.....
कोंपलें फिर फूट आयी हैं, कहना उसे....