
सफर
निरंतर
यह जनम
एक पड़ाव भर
भटकती हूँ मैं
जगह जगह
पहर पहर
सिमट बिखर
अपनी तलाश में
समझ , सोच और
अहसास से
मापचित्र बनाते हुए
अपनी दिशा
अंतर्मन के कम्पास से
निश्चित करते हुए
कई बार
इसलिए भी
ठहरती हूँ
किसी की आँखों में
कि रास्ता
उनके नूर में
साफ नज़र आता है
उलझे हुए तार
अलग कर
बाँधती हूँ
छोटी छोटी
मन की गाँठ
और उतरती हूँ भीतर
अपने मन के
गहरे समंदर में
जानती हूँ
चाहूँ तो सतह पर
तैर कर
पहुँच सकती हूँ
उस पार
पर मैं डूबना चाहती हूँ
इस पड़ाव में
खुद को
पाना चाहती हूँ
इस जनम
कम से कम
खुद के साथ
चलना चाहती हूँ....




5 comments:
अत्यंत सुन्दर
janati hun
chahun to satah pr pahunch
......
pr main dubana chahati hun.
--bahut sundar
प्रिय बेजी..जीवन के सफ़र मे कुछ देर साँस लेने रुकी तो लगा कि इस यात्रा मे कुछ कुछ मेरे मन की बात भी है...पढकर अच्छा लगा..
और अगले जनम भी यही इच्छा रही तो.....!
नारी सभी के साथ चलती है और अपने साथ चलना भूल जाती है आपकी यह अपने साथ चलने वाली यात्रा बहूत खूबसूरत लगी..
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