
मैं तुम्हारा
हिस्सा बनना चाहती हूँ
शब्दों कें बीच में
जैसे ठहराव पिरोया है
तरंगों को जैसे
बहाव ने थामा है
संगीत की ध्वनि तो नहीं...
स्वरों के बीच का
मौन बनना चाहती हूँ
व्यक्त करने की कोई व्याकुलता नहीं....
तुम्हारी अभिव्यक्ति का
अर्थ बनना चाहती हूँ
इमारत जो बनेगी ऊँची ही होगी....
मैं तो इसका आधार बनना चाहती हूँ
अस्तित्व में तुम्हारे...
तुम्हारी ही आत्मा है....
बस
तुम्हारा आत्मविश्वास बनना चाहती हूँ
प्रयत्न तो तुम्ही हो....
मैं तुम्हारा विश्राम बनना चाहती हूँ....
...............
अंश से अंग बन
अखंड बनना चाहती हूँ...
(photo credit-http://www.myinkblog.com/2008/07/03/create-a-trendy-music-style-background/ )




11 comments:
बेजी,
बहुत ही सुन्दर कविता अपने अंतर बहुत ही गूढ अर्थ समेटे हुये. दिल को छूने वाली पंक्तियों के लिये साधुवाद.
संगीत की ध्वनि तो नहीं...
स्वरों के बीच का
मौन बनना चाहती हूँ
व्यक्त करने की कोई व्याकुलता नहीं....
तुम्हारी अभिव्यक्ति का
अर्थ बनना चाहती हूँ
मुकेश कुमार तिवारी
sundar bhav
अति सुन्दर अभिव्यक्ति।
व्यक्त करने की कोई व्याकुलता नहीं....
तुम्हारी अभिव्यक्ति का
अर्थ बनना चाहती हूँ
बहुत सुंदर लिखा है अपने।
is sundar kavita ko padhwane ke liye bahut bahut aabhar.
अंश से अंग बनना सम्पूर्ण होने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है
सुंदर कविता !
सुन्दर भाव अभिव्यक्ति
अंश से अंग बन
अखंड बनना चाहती हूँ...
यह समर्पण भाव ही जिन्दगी में सब सुखों का मूल है
अत्यंत भावपूर्ण।
astitw men tumhaare
tumhaari hi atma hai
bs
tumhaara aatmwishwaash banana chahati hun.
----kisi ka atmawishwaash bn jaane badh kr sukh our kya hai!bahut sundar rachana.
मैं तो अक्सर ही आपकी रचनाओं को पढकर नि:शब्द ही हो जाता हूँ। सच बहुत ही सुन्दर लिखी है। शब्द नही बस मोती पिरो दिए।
इमारत जो बनेगी ऊँची ही होगी....
मैं तो इसका आधार बनना चाहती हूँ
अद्भुत।
वाह बेजी, बहुत गजब लिखा है। पाठक ही नि:शब्द हो गए।
घुघूती बासूती
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