
नयी ज़मीं पर
पौधे रोपते हुए....
जड़ों में
आती है मिट्टी
पुरानी भी....
......
पता है तुम्हे क्या....
पुरानी ज़मीं पर
पड़ती हैं दरारें...
उखड़ती जड़ें जब...
मिट्टी के संग..?!
POEMS IN HINDI moments....thoughts....emotions....analysis..... descriptions...reflections....expressions....impressions.....my words....my feelings
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Via chitthajagat.in
7 comments:
छोटे छोटे शब्दों में बड़ी गहरी बातें कह गयीं हैं आप.
उम्मीद है नयी जड़ें पुरानी मिट्टी के दर्द को समझेंगी.
कविता बहुत सुन्दर है और होली की आपको बहुत-बहुत बधाई!
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गुलाबी कोंपलें
भरम के हौसले की मांग बाद
मिटटी की पहचान कराते आपके
शब्द अतल तक प्रभावित कर रहे हैं.
\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\डॉ.चन्द्रकुमार जैन
गंभीर कविता है। नवीन का निर्माण प्राचीन के गर्भ में ही होता है।
कमाल है ... इतने कम शब्दों में इतने गहरे भाव ।
gehre bhav,sunder
सुन्दर और सारगर्भित। कम शब्दों में गहरी बात।
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