Friday, March 13, 2009

क्षति











नयी ज़मीं पर
पौधे रोपते हुए....
जड़ों में
आती है मिट्टी
पुरानी भी....

......
पता है तुम्हे क्या....
पुरानी ज़मीं पर
पड़ती हैं दरारें...
उखड़ती जड़ें जब...
मिट्टी के संग..?!

7 comments:

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

छोटे छोटे शब्दों में बड़ी गहरी बातें कह गयीं हैं आप.
उम्मीद है नयी जड़ें पुरानी मिट्टी के दर्द को समझेंगी.

विनय said...

कविता बहुत सुन्दर है और होली की आपको बहुत-बहुत बधाई!

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गुलाबी कोंपलें

Dr. Chandra Kumar Jain said...

भरम के हौसले की मांग बाद
मिटटी की पहचान कराते आपके
शब्द अतल तक प्रभावित कर रहे हैं.
\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\डॉ.चन्द्रकुमार जैन

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

गंभीर कविता है। नवीन का निर्माण प्राचीन के गर्भ में ही होता है।

संगीता पुरी said...

कमाल है ... इतने कम शब्‍दों में इतने गहरे भाव ।

mehek said...

gehre bhav,sunder

Dr. Amar Jyoti said...

सुन्दर और सारगर्भित। कम शब्दों में गहरी बात।