
शिकायत तुम्हे है
सहारों से मेरे
इनकी वजह से
लाचार हो तुम...
गर मैं हटा दूँ
फिर तुम गिरो तो....
जानोगे
मैने थामा हुआ था...
मगर तुम गिरो गर
आहत अगर हो
दर्द तो यह मेरे
जहन में उठेगा...
अगर मैं तुमको
थामे रही तो
जानोगे कैसे
मैं संबल तुम्हारा....
..........
ज़रा देख लो
मेरी आत्मा में...
नहीं मैं तुमसे
अलग हूँ
ज़रा भी...




5 comments:
लगता है जैसे शरीर का एक अंग दूसरे से बतिया रहा हो। बहुत सुंदर रचना।
बहुत बढ़िया-एक अलग सी अभिव्यक्ति.
kya likhun...shabd hi nahin soojh rahe...dil ko gahre chhoo gaya.
लगातार लिखते रहने के लिए शुभकामनाएं
सुन्दर रचना के लिए बधाई
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
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bahut gahra likhti hain aap..........ati sundar
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