Sunday, March 15, 2009

संबल













शिकायत तुम्हे है
सहारों से मेरे
इनकी वजह से
लाचार हो तुम...

गर मैं हटा दूँ
फिर तुम गिरो तो....
जानोगे
मैने थामा हुआ था...

मगर तुम गिरो गर
आहत अगर हो
दर्द तो यह मेरे
जहन में उठेगा...

अगर मैं तुमको
थामे रही तो
जानोगे कैसे
मैं संबल तुम्हारा....

..........
ज़रा देख लो
मेरी आत्मा में...
नहीं मैं तुमसे
अलग हूँ
ज़रा भी...

5 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

लगता है जैसे शरीर का एक अंग दूसरे से बतिया रहा हो। बहुत सुंदर रचना।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया-एक अलग सी अभिव्यक्ति.

poemsnpuja said...

kya likhun...shabd hi nahin soojh rahe...dil ko gahre chhoo gaya.

रचना गौड़ ’भारती’ said...

लगातार लिखते रहने के लि‌ए शुभकामना‌एं
सुन्दर रचना के लि‌ए बधा‌ई
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
http://www.rachanabharti.blogspot.com
कहानी,लघुकथा एंव लेखों के लि‌ए मेरे दूसरे ब्लोग् पर स्वागत है
http://www.swapnil98.blogspot.com
रेखा चित्र एंव आर्ट के लि‌ए देखें
http://chitrasansar.blogspot.com

vandana said...

bahut gahra likhti hain aap..........ati sundar