Wednesday, March 18, 2009

मेमोरी स्क्रिप्ट

स्मृति की लिपि















ठिकानों की तलाश में
अक्सर रास्ते गुम जाते है....

दोष अनुभव का ही शायद...
कि यही रास्ते
बार बार
सामने आ जाते हैं......

......

संकेतों के बावजूद
यँही उलझ...
ठिकाने दूर रह जाते हैं.....

8 comments:

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर भाव अभिव्यक्ति

आरजू ले कर घर से निकलते क्यूं हो
पांव जलते हैं तो आग पर चलते क्यूं हो

kuhasa said...

शायद संकेतों का अर्थ निकलते हुए अपनी प्राथमिकताएं सामने आ जाती हैं.

Dr.Bhawna said...

सुंदर भाव...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अक्सर तो ठिकाना
पता होता है
हम रास्तों में
उलझे रह जाते हैं।

ajay kumar jha said...

beji, saadar abhivaadan. aap ab bhee waisaa hee likh rahee hain, ki ham to katputliyon kee tarah kheenche chale aate hain, is baar thodee der lagee. magar ab to aanaa loaga rahegaa.

Udan Tashtari said...

उम्दा!!

विनय said...

एक बार फिर कमाल कर दिया!

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चाँद, बादल और शाम
गुलाबी कोंपलें

neha said...

good one................