
इस शहर की बारिश
मेरी गाँव सी क्यों नहीं...
खिड़कियों पर ठिठक कर थमी
थकी बूंदों में...
टहनियों से फिसलती
शरारत क्यों नहीं....
ऐसा लगता है
खारा समंदर बरस आया है....
आँसू सा स्वाद है इसका...
इसमें मेरी गाँव सी मिठास क्यों नहीं...
आशियाँ कहीं हवा में उड़ा हैं
चूज़े नन्हे कहीं खो गये हैं....
बरसती हुई हवाओं के संग...
कोलाहल सा है....
कोई बताये कलरव क्यों नहीं....
स्याह सी बोझिल..
घटायें झुकी हैं.....
इन घटाओं में श्याम उजालों की
अदायें क्यों नहीं है
....................
बारिश यहाँ भिगोती है ऐसे...
जैसे दामन में आकर कोई रो गया हो....
निकल आये दिन....उजालों के संग....
इस बरसात में मेरी गाँव सी नमी ही नहीं है.....




8 comments:
आपने सच कहा । कितना बदल जाता है सब शहर में ।इस रचना के लिए शुक्रिया ।
एक गृह-विरही सुंदर कविता।
बहुत सही ... बहुत अंतर है गांव और शहर में ... दोनो के बरसात में भी।
शायद अनदेखी सरहद खीची है गाँव ओर शहर में ......
बहुत ही सुन्दर रचना!
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तख़लीक़-ए-नज़र
aapne is Dubai ki barasat ko aankh band kar mahasus nahi kiya shayad!!
एक सच को खूबसूरत शब्दों से पीरो दिया।
बारिश यहाँ भिगोती है ऐसे...
जैसे दामन में आकर कोई रो गया हो....
निकल आये दिन....उजालों के संग....
इस बरसात में मेरी गाँव सी नमी ही नहीं है.
बेहतरीन।
बहुत सुंदर रचना
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