Sunday, March 29, 2009

भीगी भीगी सी













इस शहर की बारिश
मेरी गाँव सी क्यों नहीं...
खिड़कियों पर ठिठक कर थमी
थकी बूंदों में...
टहनियों से फिसलती
शरारत क्यों नहीं....
ऐसा लगता है
खारा समंदर बरस आया है....
आँसू सा स्वाद है इसका...
इसमें मेरी गाँव सी मिठास क्यों नहीं...
आशियाँ कहीं हवा में उड़ा हैं
चूज़े नन्हे कहीं खो गये हैं....
बरसती हुई हवाओं के संग...
कोलाहल सा है....
कोई बताये कलरव क्यों नहीं....
स्याह सी बोझिल..
घटायें झुकी हैं.....
इन घटाओं में श्याम उजालों की
अदायें क्यों नहीं है
....................

बारिश यहाँ भिगोती है ऐसे...
जैसे दामन में आकर कोई रो गया हो....
निकल आये दिन....उजालों के संग....
इस बरसात में मेरी गाँव सी नमी ही नहीं है.....

8 comments:

neeshoo said...

आपने सच कहा । कितना बदल जाता है सब शहर में ।इस रचना के लिए शुक्रिया ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

एक गृह-विरही सुंदर कविता।

संगीता पुरी said...

बहुत सही ... बहुत अंतर है गांव और शहर में ... दोनो के बरसात में भी।

डॉ .अनुराग said...

शायद अनदेखी सरहद खीची है गाँव ओर शहर में ......

विनय said...

बहुत ही सुन्दर रचना!


---
तख़लीक़-ए-नज़र

दीपक said...

aapne is Dubai ki barasat ko aankh band kar mahasus nahi kiya shayad!!

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक सच को खूबसूरत शब्दों से पीरो दिया।

बारिश यहाँ भिगोती है ऐसे...
जैसे दामन में आकर कोई रो गया हो....
निकल आये दिन....उजालों के संग....
इस बरसात में मेरी गाँव सी नमी ही नहीं है.

बेहतरीन।

manju said...

बहुत सुंदर रचना