Saturday, April 25, 2009

तीन साल का सफर

कठपुतलियों ने आज अपना तीन साल पूरा किया। तीन साल पहले यह ऐसे ही हाथ आ गई थी जैसे किसी बड़ी इमारत के किसी बंद कमरे की चाभियाँ। खोलने पर कई चीज़ों पर जमी धूल हट गई...राज़ खुले,...साज बजे...। ऐसे समय पर यहाँ लिखना शुरु किया जब मुझे कोई दिलासा या आभास नहीं था कि कोई और भी इसे पढ़ेगा। कमरा फिर बंद हो इससे पहले उसके अंदर छिपे रहस्यमयी नक्शे को डीकोड़ करना...कहीं और किसी तरह डॉक्यूमेन्ट करना...बस इतना ही चाहा था।

मुझे लिखना नहीं आता। पढ़ा इतना कम है कि इस बात पर कोई टिप्पणी करना फीज़ूल है। खुद से हिंदी में ही बात करती हूँ ...और शायद इसलिए अनायास ही हिंदी में ही लिखती चली। प्रशंसा और निंदा मिली तो अच्छा भी लगा और अजीब भी। मैं ठीक वैसे ही सतर्क हो गई जैसे कोई छोटी बच्ची हो जाती है जब उसे किसी धुन पर तल्लीन तिरकते हुए देखा जाता है।

यह सफर मेरा अपना था। बेहद निजी। पर कुछ लोग इससे जुडने लगे। ऐसे लोग जिन्हे इस सफर में दिलचस्पी थी...जो कोई खोई चाभी तलाश रहे थे...जो ऐसे कमरे से गुजर चुके थे। यहाँ जो है...साहित्य में इसका कोई स्थान है भी मुझे नहीं मालूम। पर यह एक ऐसी जगह रही जहाँ नकाब पहनना ...शब्दों और अदाओं के घुमावदार अर्थों में खुद को छिपाना जरूरी नहीं था ।

मुझे हर उस शख्स का आभास है जो इस कारवाँ से जुड़ा। ऐसे लोग भी याद हैं जो भटकते हुए आये और फिर कहीं लौट गये। और वो भी जो बार बार लौटते रहे।

अक्सर पाया है शब्द संदर्भ से अर्थ चुनते हैं। मैं एक साधन ..एक जरिया मात्र। जैसे कोई तार जिसे किसी बेजोड़ सितार पर बाँधा हो....जिसपर हलचल हो तो...संगीत उभर आता हो...।

एक संयोग मात्र...

यहाँ आप है...बस इसीलिए महफिल जमी है....आपकी शुक्रगुजार हूँ।

तीन साल के सफर से कुछ मेरी पसंद



युगल

अपेक्षित...
प्रतीक्षित निर्जीव
निःशब्द…
खड़ी मैं….

स्पर्श जो...
तेरे साँस का...
जीवित करे...


यूं ही...
बाँसुरी में लीन..
मूक...
अस्तित्व को...
फूँक कर....
दे धवनि …

चल चले साथ में...
साँस के साज में...
उनमुक्त...

सृष्टी में...
तरंग बन....
जीवन्त एक कण....

तू और मैं....




सुबह लाई जिंदगी

थोड़ी चाय में उबाल लूँ
चुस्कियों में उभार दूँ...
नास्ते में खिला दूँ
रास्ते के लिये बाँध दूँ

धीमी आँच पर थोड़ी
गर्म कर लूँ ठंडी जिन्दगी...
चूल्हे में फुला दूँ...
सिमटी पड़ी जिन्दगी...

समय के तारों से उतार लूँ
सूखी जिन्दगी....
तह कर सँभाल लूँ
सलवटों से सजी जिन्दगी....

पल्लू के कोनों पर बाँध लूँ
थोड़ी जिन्दगी....
बचपन के हाथ में खोल दूँ ...
सारी बन्दगी....

मरी आत्माओं के बीच
ओढ़ लूँ थोड़ी जिन्दगी...
उमंगों की तरफ मोड दूँ
बहती हुई यह जिन्दगी...

लोरियों के बीच
सुला दूँ तुझे जिन्दगी...
सुबह के साथ आना
फिर बुलाने मुझे जिन्दगी



झिझक
जब से याद आता है
मैं बस यहीं रही हूँ
दाना यहीं मिल जाता है
मैं यहीं चुग लेती हूँ
फुदक कर
कभी यहाँ
कभी वहाँ

कभी दूर नहीं गई
धूप का मेरा टुकड़ा
मेरे पास आ जाता है
छाँव की मेरी चादर
रोज़ ओढ़
सो जाती हूँ

कभी पोखर में
निहारती हूँ
तो पँख मुझे
दिख जाते हैं...
फुदकते फुदकते
अधखुले से खुल
जाते हैं

पँख फैला कर
उड़ान कब भरी है?!!
छलांगों में ही
गन्तव्य मुझे
मिल जाता है



आज पोखर में
अंबर देखा जब
जकड़े हुए इन पँखों ने
उड़ने का सपना
देखा है

नभ पर
एक मंजिल दिखती है
बादल से
गुज़र कर जाती है
क्षितिज तक का
रस्ता तो दिखता है
फिर रस्ता
कुछ धुँधला सा है

पँख गर मेरे पास हैं तो
मंजिल उड़ान ही होगी ना?
फिर उड़ने से
क्यों हिचकता है?
गिरने से
डर क्यूँ लगता है?!

छोटी छोटी छलांगों से
क्यूँ तृप्त हो जाता है?!
फुदकने को उड़ान
समझता है...
छाँव को आकाश
पुकारता है...






एक पत्ता छूटा सा

काल की ड़ाल से
गिरा कोई
लम्हा हूँ मैं
हौले से
ड़ोलता
भ्रम में अपने
पर खोलता
पहर पहर
लहर लहर
बहार में
बौछार में
अभिप्राय बन
अफवाह बन
माया कभी
साया कभी
रास्तों में
ख्वाब हैं
शाप हैं
और पाप हैं
कभी स्याह रास्ते
उलझे हुए कुछ वास्ते
बदलती सी गति है
अभी तेज है
फिर रुकी रुकी
छूटा हूँ मैं
टूटा हूँ मैं
ना जड़े हैं
ना अंकुर हैं
कई नाम है
पहचान है...
कुछ खास हैं
कुछ आम हैं...
मेरी गति मेरी नहीं
मेरे रास्ते यह कौन से
हवा ही साँस ले रही
मेरे गुजरते जिस्म में
मैं तो बस बाँसुरी
जो बज रहा
वह काल है
.....
काल की ड़ाल से
गिरा कोई
लम्हा हूँ मैं



दूरी

किसी वृत्त में
दो बिंदु की तरह मिले....
पास पास
मैं आगे थी...वो पीछे...
अजीब जिद थी
कि बीच का फासला
मैं तय करूँ...
...
और बस यूँ ही
फासले बढ़ गये




प्रतीक्षा

विशाल वट
विस्तृत शाखायें
उनमुक्त गगन
स्वच्छन्द मन
मज़बूत मूल
फल और फूल

डिब्बी में बंद
छोटा सा कद
बीज में लीन
नींद में तल्लीन
खोया हुआ
सोया हुआ

अनंत में
अंत सा....
अंकुर के
आरंभ के
आगे का
अंतराल

24 comments:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति और रचनाये बेहद अच्छी लगी . लिखती रहिये. आभार.

मीनाक्षी said...

तीन साल के ब्लॉग का जन्मदिन और आपका जन्मदिन दोनो को खूब मुबारकवाद... दोनो ही अपनी मंज़िल पाने मे कामयाब हों..यही कामना है... शुभकामनाएँ

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

अक्सर पाया है शब्द संदर्भ से अर्थ चुनते हैं। मैं एक साधन ..एक जरिया मात्र। ---------

शब्द तो कुम्हार की मिट्टी हैं जी, जिन्हें आकार दिया जाना चाहिये। कबीर की तरह - जो शब्दों की महंतई से कभी बन्धे नहीं।

अनिल कान्त : said...

ये रचनायें पढ़वाने के लिए शुक्रिया ...
और तीन साल पूरे होने पर बधाई ...यूँ ही लिखती रहें

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बेजी, तीन साल पूरे कर लेने की बधाई! आप का लिखा साहित्य है वह भी अद्भुत। आप की कविताएँ हर चीज को चाहे वह भावना हो या फिर पदार्थ तुरंत जीवन से जोड़ लेती हैं। निर्जीव को सजीव कर देती हैं। यही इन का प्रधान सत्व है।

योगेंद्र कृष्णा Yogendra Krishna said...

बहुत-बहुत बधाई…

aflatoon said...

कविताओं को फिर फिर पढ़ना है |शुक्रिया ,बेजी |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर चित्र-गीत,
जैसे आराधना में
वन्दना समा गयी हो।
बधाई।
अभी मेरा ब्लॉग का सफर तो
मात्र तीन मास का ही है।
आपको तीन साल का ब्लॉग का सफर
मुबारक हो।

MANVINDER BHIMBER said...

तीन साल के ब्लॉग का जन्मदिन और आपका जन्मदिन दोनो को खूब मुबारकवाद... दोनो ही अपनी मंज़िल पाने मे कामयाब हों..यही कामना है

Mired Mirage said...

तीन साल की सफल यात्रा के लिए बधाई। ऐसे ही लिखती रहें और हमें पढवाती रहें।
घुघूती बासूती

रवीन्द्र रंजन said...

यूं ही जारी रहे ये सफर। तीसरी वर्षगांठ की बधाई।

बी एस पाबला said...

मुझे याद नहीं कि कभी आपका ब्लॉग देखा हो, लेकिन नाम ज़रूर सुन रखा था। अनिता जी ने बताया तो पता चला कि 26 अप्रैल आपका जनमदिन है सो बधाई देने आ गया।

आपको जनमदिन की बधाई और शुभकामनायें।

यह तारीख मैंने यहाँ जोड़ ली है

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

तीन साल पूरे होने पर बधाई..जन्मदिन की पहले दे चुकी हूँ ..फिर दुबारा से ढेर सारी शुभकामनायें

संगीता पुरी said...

तीसरी वर्षगांठ की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

तीन साल पूरे होने पर बधाई ...यूँ ही लिखती रहें

Udan Tashtari said...

केक तो खिलाओ :)

Udan Tashtari said...

बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

डॉ .अनुराग said...

ओर हाँ एक अदद केक खिलाने की कुछ रवायत में आपका यकीन है या नहीं ???

डॉ .अनुराग said...

"मुझे लिखना नहीं आता। पढ़ा इतना कम है कि इस बात पर कोई टिप्पणी करना फीज़ूल है। "


"विनम्रता की चाशनी में लपेट कर झूठ भी बोलेगी तो कोई यकीन नहीं करेगा....कम से कम हम तो नहीं....."सुबह लायी जिंदगी " आपकी बेहतरीन रचनाओ में से एक है ओर बेहद खालिस किसी पढ़े -लिखे कवि की कविता भी दिखायी पड़ती है ..शुक्रिया आपका की आपने कितनी सवेदनाये कागज़ पे उकेरी....दुआ के ये कठपुतली थिरकती रहे यूँ ही...

अर्चना said...

janmdin ewam tin saal poore hone ki badhaai. Itani achchhi kawitaon ke liye bhi badhaai.

Parul said...

badhaayi beji..dono baaton ki

दीपक said...

"दूरी "

बहुत सुंदर ्कविता लगी !!

अजित वडनेरकर said...

आते रहे, लौटते रहे। तकनीक के फेर में टिप्पणी दर्ज न कर सके। आज फिर लौटे हैं...

तीन साल पूरे होने की बधाई....

poemsnpuja said...

सुबह लायी जिंदगी इतनी खूबसूरत लगी की तारीफ़ को शब्द नहीं...इतने खूबसूरत बिम्ब जैसे धूप खेल रही हो...वो भी जनवरी की गुनगुनाहट लिए हुए. एक एक शब्द जैसे किसी याद को टटोल सा जाता है...अद्भुत लिखती हैं आप बेजी. तीन साल पूरे करने की बधाई...इसी बहाने इतनी सुन्दर कवितायेँ एक जगह पढने को मिल गयीं. आपके जन्मदिन की मुबारक देने को देर हो गयी है...अगले साल दे दूंगी :)