
हमेशा हिंसा के साथ
शोर नहीं उठता
कोई हथियार
नहीं दिखता
क्रोध हावी नहीं होता
ना कोई लहूलुहान होता है.....
मौन को म्यान से निकाल
धार को
तेज़ कर
एक बेपरवाह नज़र के साथ
वार....
नहीं खून नहीं बहता.....
दर्द उठता है
और चीख भी उठती है....
लोग मुड़ कर देखते हैं
....फिर आगे बढ़ जाते हैं....
मौन मुस्कुराता है.....
............
हिंसा की जगह वह कभी
उँगलियों के निशां नहीं छोड़ता.......




7 comments:
बहुत बढ़िया कविता लिखी है , न कोई लहुलुहान दिखता है न कोई निशान दिखता है , पर कितने निशान यादों की किताब में छोड़ जाता है , तभी तो ऐसी कवितायेँ उभर कर आतीं हैं ?
यह तो हथियारों के इस्तेमाल से ज्यादा घातक हिंसा है।एक झटके वाली भी नहीं ,लगातार चुभने वाली।
हम तो आपके पुराने मुरीद हैं, बहुत सुन्दर रचना
बहुत गहन रचना है.
ये लालटेन कहाँ मिल गई फोटू खिंचवाने के लिए??
अच्छी फोटो है, बधाई!!
बहुत सही कहा है। मौन से अधिक पैनी कोई तलवार नहीं हो सकती।
घुघूती बासूती
umda/
मौन को म्यान से निकाल
धार को
तेज़ कर
एक बेपरवाह नज़र के साथ
वार....
achhi panktiya he/
दर्द उठता है
.........लोग देखते हैं और आगे बढ जाते हैं
अच्छा लिखा है बधाई......!
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