Sunday, May 17, 2009

खामोश















हमेशा हिंसा के साथ
शोर नहीं उठता
कोई हथियार
नहीं दिखता
क्रोध हावी नहीं होता
ना कोई लहूलुहान होता है.....
मौन को म्यान से निकाल
धार को
तेज़ कर
एक बेपरवाह नज़र के साथ
वार....
नहीं खून नहीं बहता.....
दर्द उठता है
और चीख भी उठती है....
लोग मुड़ कर देखते हैं
....फिर आगे बढ़ जाते हैं....


मौन मुस्कुराता है.....

............
हिंसा की जगह वह कभी
उँगलियों के निशां नहीं छोड़ता.......

7 comments:

शारदा अरोरा said...

बहुत बढ़िया कविता लिखी है , न कोई लहुलुहान दिखता है न कोई निशान दिखता है , पर कितने निशान यादों की किताब में छोड़ जाता है , तभी तो ऐसी कवितायेँ उभर कर आतीं हैं ?

अफ़लातून said...

यह तो हथियारों के इस्तेमाल से ज्यादा घातक हिंसा है।एक झटके वाली भी नहीं ,लगातार चुभने वाली।

विनय said...

हम तो आपके पुराने मुरीद हैं, बहुत सुन्दर रचना

Udan Tashtari said...

बहुत गहन रचना है.

ये लालटेन कहाँ मिल गई फोटू खिंचवाने के लिए??

अच्छी फोटो है, बधाई!!

Mired Mirage said...

बहुत सही कहा है। मौन से अधिक पैनी कोई तलवार नहीं हो सकती।
घुघूती बासूती

अमिताभ श्रीवास्तव said...

umda/
मौन को म्यान से निकाल
धार को
तेज़ कर
एक बेपरवाह नज़र के साथ
वार....
achhi panktiya he/

ड़ा.योगेन्द्र मणि कौशिक said...

दर्द उठता है

.........लोग देखते हैं और आगे बढ जाते हैं
अच्छा लिखा है बधाई......!