
गुलामी
बहुत प्राचीन
प्रवृत्ति है....
शायद इसीलिए लोग
नौकरी भी
गुलामी की तरह करते हैं....
परवरिश भी
सर झुकाने की अदा
सिखाने का
प्रशिक्षण भर है....
मालिक और गुलाम
का खेल
सभी रचाये बैठे हैं
हर उनमुक्त
ख्याल पर कई
घात लगाये
गए हैं
जो पैरों पर
खड़े हों तो तुरंत
हथकड़ी पहना दें इनको....
ज़रा देखो
तुम्हारे ख्यालों को किसने
परास्त किया है.....
वही तुम्हारा मालिक...
तुम उसके गुलाम हुए हो....




9 comments:
बढिया ।
गुलामी की चरम अवस्था में वह पसन्द आने लगती है । अच्छा - बुरा सब मालिक सोच लेगा,हम चिन्ता-मुक्त हुए ??
हर उनमुक्त
ख्याल पर कई
घात लगाये
गए हैं
अच्छा आघात घात लगाये बैठे लोगो पर
bahut sunder
सोचने को विवश करती रचना।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
सुंदर चिंतन, यह भी गुलामी से बाहर आना ही है।
बहुत सुन्दर सोच से परिपक्व रचना का विकास हुआ है
---
चाँद, बादल और शाम
बहुत बढ़िया.
"ज़रा देखो
तुम्हारे ख्यालों को किसने
परास्त किया है.....
वही तुम्हारा मालिक...
तुम उसके गुलाम हुए हो...."
सुन्दर रचना।
har unmukt khyaal ......lagaye gaye hai.---bahut achchhi lagi.
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