Thursday, June 18, 2009

अधीन












गुलामी
बहुत प्राचीन
प्रवृत्ति है....


शायद इसीलिए लोग
नौकरी भी
गुलामी की तरह करते हैं....

परवरिश भी
सर झुकाने की अदा
सिखाने का
प्रशिक्षण भर है....

मालिक और गुलाम
का खेल
सभी रचाये बैठे हैं


हर उनमुक्त
ख्याल पर कई
घात लगाये
गए हैं


जो पैरों पर
खड़े हों तो तुरंत
हथकड़ी पहना दें इनको....


ज़रा देखो
तुम्हारे ख्यालों को किसने
परास्त किया है.....
वही तुम्हारा मालिक...
तुम उसके गुलाम हुए हो....

9 comments:

सुजाता said...

बढिया ।

अफ़लातून said...

गुलामी की चरम अवस्था में वह पसन्द आने लगती है । अच्छा - बुरा सब मालिक सोच लेगा,हम चिन्ता-मुक्त हुए ??

M Verma said...

हर उनमुक्त
ख्याल पर कई
घात लगाये
गए हैं
अच्छा आघात घात लगाये बैठे लोगो पर
bahut sunder

Science Bloggers Association said...

सोचने को विवश करती रचना।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर चिंतन, यह भी गुलामी से बाहर आना ही है।

‘नज़र’ said...

बहुत सुन्दर सोच से परिपक्व रचना का विकास हुआ है

---
चाँद, बादल और शाम

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"ज़रा देखो
तुम्हारे ख्यालों को किसने
परास्त किया है.....
वही तुम्हारा मालिक...
तुम उसके गुलाम हुए हो...."

सुन्दर रचना।

अर्चना said...

har unmukt khyaal ......lagaye gaye hai.---bahut achchhi lagi.