
शब्द अलग थलग
संयोग और संयोजक के
इंतज़ार में
जैसे शोर एक भीड का ...
जिसकी कोई भाषा नहीं
शून्य के शोर में
बोध जो हावी हो रहा
क्रम ठिठक कर है खडा
निष्कर्ष अधूरा ही सही...
संभावनाओं के लिये
विकल्पों का चुनाव है
नये किसी अध्याय का
जुड़ना यहाँ सँभव नही
जीवनी की किताब से
बन सकती हूँ कोई जीवनी
नये जोखिम उठाने का
बीमा यहाँ होता नही
विचार को आचार से
लाद कर, गति मंद कर
निभा रहे दायित्व सब
नव अभिप्राय मार कर.....
संयोजक के अभाव मे
शब्द के भीड का...
भाव का...
कोई भी ठोस अर्थ नहीं
संयोग की कड़ी को
लगने मे अभी देर है..
नूतन किसी अभिप्राय का
हाल मे अवसर नहीं




6 comments:
बेजी ,
फिर वही शब्द, फिर वही अंदाज, फिर वही जादो , फिर वही प्रभाव....सुन्दर ....हमेशा की तरह
संयोग की कड़ी को
लगने मे अभी देर है..
नूतन किसी अभिप्राय का
हाल मे अवसर नही
बेहतरीन --- बहुत खूब
लाजवाब
bahut bahut hee khubsoorat rachana ......andaaj thoda hatake hai ....jisase kawita jiwit ho uthi hai .....bahut bahut badhaaee
आपकी रचना पढ़ने का मुझे जितना इंतिज़ार रहता है, उतनी ही बढ़िया रचना पढ़ने को मिल जाती है।
संयोग,संयोजन और संयोजक के चिन्तन
से परिपूर्ण कविता के लिए बधाई।
bahut sundar beji.........
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