
यकीं मानो
खामोशी जिस्म पहनती है
पसर कर कहीं
बैठ जाती है जब
तब
बीच की जगह भर जाती है....
साही की तरह
नुकीले काँटे पहन
इस तरह
पास आती है...
कि बहुत नज़दीक बैठे हुए से भी
फासला बढ़ जाता है....
मैने देखा है इसे
आलिंगन को पहनते हुए
और तब
आगोश की तरह
गरम हो
रूह को छू लेती है....
खामोशी की परछाई है.....
कभी लंबी
कभी छोटी.....
कभी अँधेरे सी यह लगती है
और कभी
छाया सी ठंडक देती है...
कभी यह आवाज़ देती है
कभी इतना शोर मचाती है
हर आवाज़ से ऊँची
बस वही सुनाई देती है...
खामोशी चुप भी होती है
मुँह पर उँगली रख कर
सहमी हुई सी
किसी रूठे हुए बच्चे की
आँख के छोर पर
रुके आँसू की तरह.......
बेबस वहीं ठिठक रुक जाती है....
ऐसे में जब कोई
शब्द के पोर से
छूकर...
भर लेता है बाहों में...
आवाज़ बन, अनुराग बन......
खामोशी रो देती है.....




13 comments:
उम्दा व लाजवाब रचना।
सही कहा आपने ये खामोशी भी बहुत अजीब होती है...बहुत अच्छी रचना लगी
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
खामोशी खामोशी से जो कुछ कह देती है वह --
बहुत बारीकी से आपने खामोशी का विश्लेषण किया है और बेहद खूबसूरती से या यूँ कही खामोशी से दिल मे उतार दिया.
बहुत खूब
khamoshi ka har rang har roop bayan kar diya aapne.....badhayi
खामोशी की कई आकृतियों को आपने अपने रचना में सफलतापूर्वक दिखलाया है। सचमुच खामोशी की भी अपनी आवाज होती है।
ख़ामोशी के भाव को कोमल सी अभिव्यक्ति...
अच्छा लगा...
भावपूर्ण गहन रचना!
सुन्दर.
गणेश उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।
बेहद सुन्दर कवितां सचमुच आप शब्दों की बुनाई बड़े खूबसूरत तरीके से करती है।
प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.log.co.in
बेहद सुन्दर रचना है, दिल में उतर गयी
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'चर्चा' पर पढ़िए: पाणिनि – व्याकरण के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार
khaamoshi ke saare rang achchhe lage.bahut khoob.
ऐसे में जब कोई
शब्द के पोर से
छूकर...
भर लेता है बाहों में...
आवाज़ बन, अनुराग बन......
खामोशी रो देती है.....bahut sataati hai ye khamoshi kabhi kabhi ...jaane kyun
aap ka likha hamesha adbhut hota hai
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