Sunday, August 23, 2009

खामोशी की आकृति












यकीं मानो
खामोशी जिस्म पहनती है
पसर कर कहीं
बैठ जाती है जब
तब
बीच की जगह भर जाती है....

साही की तरह
नुकीले काँटे पहन
इस तरह
पास आती है...
कि बहुत नज़दीक बैठे हुए से भी
फासला बढ़ जाता है....

मैने देखा है इसे
आलिंगन को पहनते हुए
और तब
आगोश की तरह
गरम हो
रूह को छू लेती है....

खामोशी की परछाई है.....
कभी लंबी
कभी छोटी.....
कभी अँधेरे सी यह लगती है
और कभी
छाया सी ठंडक देती है...


कभी यह आवाज़ देती है
कभी इतना शोर मचाती है
हर आवाज़ से ऊँची
बस वही सुनाई देती है...

खामोशी चुप भी होती है
मुँह पर उँगली रख कर
सहमी हुई सी
किसी रूठे हुए बच्चे की
आँख के छोर पर
रुके आँसू की तरह.......
बेबस वहीं ठिठक रुक जाती है....

ऐसे में जब कोई
शब्द के पोर से
छूकर...
भर लेता है बाहों में...
आवाज़ बन, अनुराग बन......
खामोशी रो देती है.....

13 comments:

Mithilesh dubey said...

उम्दा व लाजवाब रचना।

अनिल कान्त : said...

सही कहा आपने ये खामोशी भी बहुत अजीब होती है...बहुत अच्छी रचना लगी

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

M VERMA said...

खामोशी खामोशी से जो कुछ कह देती है वह --
बहुत बारीकी से आपने खामोशी का विश्लेषण किया है और बेहद खूबसूरती से या यूँ कही खामोशी से दिल मे उतार दिया.
बहुत खूब

vandana said...

khamoshi ka har rang har roop bayan kar diya aapne.....badhayi

श्यामल सुमन said...

खामोशी की कई आकृतियों को आपने अपने रचना में सफलतापूर्वक दिखलाया है। सचमुच खामोशी की भी अपनी आवाज होती है।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

ख़ामोशी के भाव को कोमल सी अभिव्यक्ति...
अच्छा लगा...

Udan Tashtari said...

भावपूर्ण गहन रचना!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर.
गणेश उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Pramod Tambat said...

बेहद सुन्दर कवितां सचमुच आप शब्दों की बुनाई बड़े खूबसूरत तरीके से करती है।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.log.co.in

विनय ‘नज़र’ said...

बेहद सुन्दर रचना है, दिल में उतर गयी
---
'चर्चा' पर पढ़िए: पाणिनि – व्याकरण के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार

अर्चना said...

khaamoshi ke saare rang achchhe lage.bahut khoob.

pukhraaj said...

ऐसे में जब कोई
शब्द के पोर से
छूकर...
भर लेता है बाहों में...
आवाज़ बन, अनुराग बन......
खामोशी रो देती है.....bahut sataati hai ye khamoshi kabhi kabhi ...jaane kyun

कंचन सिंह चौहान said...

aap ka likha hamesha adbhut hota hai