Thursday, October 29, 2009

पहल














ऐसे भी रुकती है हवा
सांस रोक कर
कि उसके पांव
वहीं जड हो जाते हैं
........
ठोस
............
जैसे कोई दीवार खडी हो गई हो....
और उमस के साथ
उठती है
किसी बासी बात की गंध
सन्नाटे सी काई के नीचे
कुम्हला जाते हैं सुर
ध्वनि गूंगी हो जाती है
.................

मालूम है ना
ठहरी हुई हवा में
संगीत उभरता नहीं कभी
...............



क्यूँ ना...
तुम ही सांस फूंक दो
कि थोडी हलचल तो हो....

13 comments:

Pramod Singh said...

हूं. फूंकने की कोशिश किये लेकिन देख रहे हैं सांस अटक रही है..

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ठहर जाए जब जीवन उसे कोई प्रेरणा चाहिए।
जीवन के लिए एक जीवन्त कविता।

वन्दना said...

bahut hi gahan ahsaas.

अजय कुमार said...

क्यूँ ना...
तुम ही सांस फूंक दो
कि थोडी हलचल तो हो....

गहरे भाव

BAD FAITH said...

चल सकूँ...
छू सकूँ…
आज मैं...
काश मैं...
मैं बन सकूँ
क्यूँ ना...
तुम ही सांस फूंक दो
कि थोडी हलचल तो हो....
शानदार. !

Sunil Bhaskar said...

इतने गहरे भाव हैं की जिमें हम कहीं बहुत गहरे तक डूब जाते हैं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

क्यूँ ना...
तुम ही सांस फूंक दो
कि थोडी हलचल तो हो....

बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति है।
बधाई।।

पारूल said...

:-)bahut acchey..BEJI

ओम आर्य said...

waah kya bat hai in thami hawaa me jo mar ke ji uthega .ye pyar kuchh aisi hi chij hoti hai ....

रंजना said...

Waah !!! Bahut bahut sundar !!!

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

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जय ब्लोगिग-विजय ब्लोगिग
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Beji Jaisonji

क्यूँ ना...
तुम ही सांस फूंक दो
कि थोडी हलचल तो हो....

सुन्‍दर शब्‍द, सुंदर अभिव्यक्ति, Jaisonji! इन्ही शब्दो मे आपकी रचना के लिऍ मेरे भाव है. लिखते रहे>
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मगलभावनाओ सहीत
मुम्बई-टाईगर
SELECTION & COLLECTION

डॉ .अनुराग said...

एक शब्द में कहूं तो "बेमिसाल "

Rajesh Srivastavaa said...

yaar aap ki baat mein hamesha dum rehta hai! la-jabaab