Sunday, November 01, 2009

उद्यम













अपनी ज़मीन
और आसमां के बीच
क्षितिज के
दहलीज़ पर
एक तख्ते के ऊपर
पंक्ति में
अपराधियों की तरह
सारे
भ्रम विभ्रम
जो उभर आये
मानस पटल पर
चित्त के
दोगले संतान की तरह
...............
धकेलना है इन्हे
सीमाओं के परे
कोई ऐसी जगह
ब्रह्माण्ड में
जहाँ यह
सांस ले सके
शाश्वत सत्य की तरह....

7 comments:

अनिल कान्त : said...

वाह क्या गहरी बात कह दी आपने कविता के माध्यम से

वन्दना said...

adbhut.........umda...........badhayi.

M VERMA said...

भ्रम विभ्रम
जो उभर आये
मानस पटल पर
चित्त के
दोगले संतान की तरह
अलग सा बिम्ब और भाव और फिर इन ब्रह्माण्ड में सांस ले सकने की जगह प्रत्यारोपित करने की तमन्ना.
वाह खूब

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

हमेशा की तरह सुंदर रचना।

अजय कुमार झा said...

एक एक शब्द को इतना नाप तोल कर रखती हैं आप कि हम तो कठपुतली की तरह खुद खिंचे चले आते हैं...

अजित वडनेरकर said...

भ्रम-विभ्रम चित्त की दोगली संतान!!!
क्या खूब फेंटा, निचोड़ा है ज्ञान।
मजा़ आ गया। दर्शनशास्त्र की डॉक्टर होतीं काश!!!

सुंदर कविता...
जैजै

Kamlesh Kumar Diwan said...

achchi kavitayen likhi hai