
अपनी ज़मीन
और आसमां के बीच
क्षितिज के
दहलीज़ पर
एक तख्ते के ऊपर
पंक्ति में
अपराधियों की तरह
सारे
भ्रम विभ्रम
जो उभर आये
मानस पटल पर
चित्त के
दोगले संतान की तरह
...............
धकेलना है इन्हे
सीमाओं के परे
कोई ऐसी जगह
ब्रह्माण्ड में
जहाँ यह
सांस ले सके
शाश्वत सत्य की तरह....




7 comments:
वाह क्या गहरी बात कह दी आपने कविता के माध्यम से
adbhut.........umda...........badhayi.
भ्रम विभ्रम
जो उभर आये
मानस पटल पर
चित्त के
दोगले संतान की तरह
अलग सा बिम्ब और भाव और फिर इन ब्रह्माण्ड में सांस ले सकने की जगह प्रत्यारोपित करने की तमन्ना.
वाह खूब
हमेशा की तरह सुंदर रचना।
एक एक शब्द को इतना नाप तोल कर रखती हैं आप कि हम तो कठपुतली की तरह खुद खिंचे चले आते हैं...
भ्रम-विभ्रम चित्त की दोगली संतान!!!
क्या खूब फेंटा, निचोड़ा है ज्ञान।
मजा़ आ गया। दर्शनशास्त्र की डॉक्टर होतीं काश!!!
सुंदर कविता...
जैजै
achchi kavitayen likhi hai
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