
हवा,घटा और तूफान
मैं जंगल थी
और खोई हुई पगडंडी भी
गहन गाढ़ा कोई अहसास
मिट्टी भी
गले पत्तों में
पनपता कोई अंकुर भी
मैं वो लम्हा थी
जहाँ सच के दायरे
अपनी जड़े कस रहे थे
मैं आवाज़ थी...
और वह शब्द भी
जो अर्थ खो चुका अब तक
मैं वो पहचान थी
जिसका नाम ही ना था
वो संवाद थी
जिसका अनुवाद असँभव था...
प्रसंग भी....कहानी भी...
अनूठा कोई अनुभव भी....
.....खंडित पहचान के
अंश सी...
विभाजित....
अकेली थी...
सहेली थी....
पहेली थी...
समाधान भी...
एक लम्हा ही सही
समूची थी...
अपूर्व थी...
संपूर्ण थी...




8 comments:
प्रकृति!
एक लम्हा ही सही
समूची थी...
अपूर्व थी...
संपूर्ण थी...
जीवन के कुछ लम्हे वाकई अपूर्व और सम्पूर्ण होते है
बहुत खूबसूरत भाव की कविता
हमेशा की तरह-एक उम्दा अभिव्यक्ति!! आजकल लिखना कम है, क्यूँ?
खूबसूरत भाव की पंक्तियाँ।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
वो संवाद थी
जिसका अनुवाद असँभव था...
very nice....
सुन्दर रचना!
लिखते रहो!
ek bahut hi anoothi rachna........badhayi
"मैं वो लम्हा थी
जहाँ सच के दायरे
अपनी जड़े कस रहे थे"
वाह वाह - बहुत खूब. इस श्रेष्ठ रचना में रेखांकित करने के लिए और भी बहुत कुछ है.
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