Friday, November 13, 2009

मैं














हवा,घटा और तूफान
मैं जंगल थी
और खोई हुई पगडंडी भी
गहन गाढ़ा कोई अहसास
मिट्टी भी
गले पत्तों में
पनपता कोई अंकुर भी
मैं वो लम्हा थी
जहाँ सच के दायरे
अपनी जड़े कस रहे थे
मैं आवाज़ थी...
और वह शब्द भी
जो अर्थ खो चुका अब तक
मैं वो पहचान थी
जिसका नाम ही ना था
वो संवाद थी
जिसका अनुवाद असँभव था...
प्रसंग भी....कहानी भी...
अनूठा कोई अनुभव भी....
.....खंडित पहचान के
अंश सी...
विभाजित....
अकेली थी...
सहेली थी....
पहेली थी...
समाधान भी...
एक लम्हा ही सही
समूची थी...
अपूर्व थी...
संपूर्ण थी...

8 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

प्रकृति!

M VERMA said...

एक लम्हा ही सही
समूची थी...
अपूर्व थी...
संपूर्ण थी...
जीवन के कुछ लम्हे वाकई अपूर्व और सम्पूर्ण होते है

बहुत खूबसूरत भाव की कविता

Udan Tashtari said...

हमेशा की तरह-एक उम्दा अभिव्यक्ति!! आजकल लिखना कम है, क्यूँ?

श्यामल सुमन said...

खूबसूरत भाव की पंक्तियाँ।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

सागर said...

वो संवाद थी
जिसका अनुवाद असँभव था...

very nice....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर रचना!
लिखते रहो!

वन्दना said...

ek bahut hi anoothi rachna........badhayi

हृदय पुष्प said...

"मैं वो लम्हा थी
जहाँ सच के दायरे
अपनी जड़े कस रहे थे"
वाह वाह - बहुत खूब. इस श्रेष्ठ रचना में रेखांकित करने के लिए और भी बहुत कुछ है.