Wednesday, January 21, 2009

तेरे बिन













झूठी आधी अधूरी ख्वाईशें
सिरहाने रखी हैं...
बड़ी मीठी हैं ये...
सच मैने चखी हैं...

ज़रा स्वाद लोगे
तो ऐसा लगेगा
जैसे नारीयल की मीठी
शराब हो....

थोड़ा नशा है
थोड़ी प्यास भरी है
जब यह घुलेंगी
तुम्हारी नींद उड़ेगी

अधूरी सी बातें
आधी रात में....
कटे चाँद में आ
बेकरार करेंगी....

........
हैरान हो...?!!
........
तुम्हे क्या लगा
अकेले यूँ ही....
नींद आ जायेगी?!!

Friday, January 16, 2009

अपेक्षा














सड़क पार करते हुए
हाथ पकड़ा था
जैसे अचानक से मेरा
उस दिन का लड़खड़ा कर
गिर जाना याद आया हो....

फिर चाट की दुकान पर
रुक कर पूछा था
गोल गप्पे खायेगी...
मेरे सर हिलाने पर
फिर हाथ पकड़ कर
आगे बढ़ गये

मैं देख रही थी
तुम्हारा रुक रुक कर चलना
जैसे मेरे चेहरे पर उठते हुए
अपेक्षाओं के जवाब
किसी कुंजी में ढूँढ़ रहे हो...

अपेक्षाओं से हमेशा
घबरा जाते हो तुम
अपनी सोच की गहराईयों
में उतर कर
सोचते हो क्या चाहती हूँ मैं....

मैं हताश होती हूँ...
और फिर मुझे देख तुम भी...
बताओ..
आँख की सतह पर तैरता ख्वाब
देखने के लिए
इतना गहरा क्यूँ उतरते हो...?!!!

Friday, January 09, 2009

देने को तो...












देने को तो दे सकते थे....

सात रंग पहनाकर
कोई किरण
मन में फुदकता
कोई हिरण
दवा सी नज़र
दुआ सा असर
खट्टी मीठी चटपटी
इमली सी हँसी
कोई बात पुरानी
रंगों में भीगी फँसी
कच्चे अमरूद का
चोरी का स्वाद
खुद ही सँभाली छिपाई
कोई याद
साथ बैठकर पी कोई चाय सी
ताज़ी नज़र
रसीली,रसभरी छुअन सा
कोई असर....

देने को तो दे सकते थे....
खुशबू से भरी
थोड़ी पवन
मुस्कुराहट भरा
कोई चमन
बिछड़े हुए
रास्तों की खबर
दोस्त पुराने...
सबर का हुनर....

कहते हो मुझे
जान हाज़िर है मेरे लिए...

बताओ....
दी हुई चीज़ भी कोई बार बार देता है भला....

Monday, January 05, 2009

प्रबल













तूफाँ में बुझती भी है...
धधकती भी है
आग.....
......
जलते रहने की
कशिश
कितनी है...
हवा में
परखती है आग.....