Sunday, February 22, 2009

नि:शब्द











मैं तुम्हारा
हिस्सा बनना चाहती हूँ
शब्दों कें बीच में
जैसे ठहराव पिरोया है
तरंगों को जैसे
बहाव ने थामा है
संगीत की ध्वनि तो नहीं...
स्वरों के बीच का
मौन बनना चाहती हूँ
व्यक्त करने की कोई व्याकुलता नहीं....
तुम्हारी अभिव्यक्ति का
अर्थ बनना चाहती हूँ
इमारत जो बनेगी ऊँची ही होगी....
मैं तो इसका आधार बनना चाहती हूँ
अस्तित्व में तुम्हारे...
तुम्हारी ही आत्मा है....
बस
तुम्हारा आत्मविश्वास बनना चाहती हूँ
प्रयत्न तो तुम्ही हो....
मैं तुम्हारा विश्राम बनना चाहती हूँ....

...............
अंश से अंग बन
अखंड बनना चाहती हूँ...




(photo credit-http://www.myinkblog.com/2008/07/03/create-a-trendy-music-style-background/ )

Wednesday, February 04, 2009

यात्रा














सफर
निरंतर
यह जनम
एक पड़ाव भर
भटकती हूँ मैं
जगह जगह
पहर पहर
सिमट बिखर
अपनी तलाश में
समझ , सोच और
अहसास से
मापचित्र बनाते हुए
अपनी दिशा
अंतर्मन के कम्पास से
निश्चित करते हुए
कई बार
इसलिए भी
ठहरती हूँ
किसी की आँखों में
कि रास्ता
उनके नूर में
साफ नज़र आता है
उलझे हुए तार
अलग कर
बाँधती हूँ
छोटी छोटी
मन की गाँठ
और उतरती हूँ भीतर
अपने मन के
गहरे समंदर में
जानती हूँ
चाहूँ तो सतह पर
तैर कर
पहुँच सकती हूँ
उस पार
पर मैं डूबना चाहती हूँ
इस पड़ाव में
खुद को
पाना चाहती हूँ
इस जनम
कम से कम
खुद के साथ
चलना चाहती हूँ....

Monday, February 02, 2009

जंगली फूल




















कभी जादू की तरह
अकेले रास्तों में
आँख मल कर
उठते हैं नन्हे कोंपल
बेमौसम, बेवजह,बेशर्त
ज़रा सी नमी से
बसंत सजा जाते हैं....

मोड़ हसीं हो जाते हैं...
और रास्ते
फिर से...
मंजिल की खोज में
बदल जाते हैं...