
ऐसे भी रुकती है हवा
सांस रोक कर
कि उसके पांव
वहीं जड हो जाते हैं
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ठोस
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जैसे कोई दीवार खडी हो गई हो....
और उमस के साथ
उठती है
किसी बासी बात की गंध
सन्नाटे सी काई के नीचे
कुम्हला जाते हैं सुर
ध्वनि गूंगी हो जाती है
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मालूम है ना
ठहरी हुई हवा में
संगीत उभरता नहीं कभी
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क्यूँ ना...
तुम ही सांस फूंक दो
कि थोडी हलचल तो हो....




