
इस वक्त और अनंत के बीच
किसी गहरे गर्त में
ठहरा हुआ
कोई बोध...
तृषित...
अधूरा...
अस्तित्व की निरर्थकता से निढ़ाल
अनभिज्ञ आकर्षण के बीच
ऐंठा हुआ
तलाशता है
अपना शेष अंश…
सोचती हूँ…
काश शिनाख्त हो पाती....
............
तो दफ्न ही कर आती.....
फोटो- गूगल (Bermuda Triangle)




5 comments:
बहुत प्रतीक्षा के बाद पढ़ने को मिली आप की कोई कविता।
बहुत सुंदर कविता है।
लेकिन ..
हो जाएगी जब शिनाख्त
शेष की
जरूरत कहाँ होगी?
उसे दफ्न करने की
तब आप स्वयं होंगी
विराट
सब कुछ होगा आप में,
सारे अस्तित्व
जो कुछ भी है अनंत तक
और न होगा
कोई आकाश
दफ्न करने के लिए
कुछ भी।
यहाँ तो शिनाख्त करने वाले की ही शिनाख्त ही तो नही हो पाती वर्ना --------
अब द्विवेदी जी ने जो कुछ
कहा
सहमत हैं उससे।
कुछ और
कहें क्या...
बहुत ही सुन्दर भाव्…………॥द्विवेदि जी ने सही कहा है।
कुछ शब्द.. बहुत कुछ कहते हैं।
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