Monday, March 29, 2010

बस बहुत हुआ










बस बहुत हुआ.........
अब हवा को हवा दो
घटा को नदी
सूखी ज़मीं को दे दो
थोड़ी नमी
आँख मींचे सोये हुए
सपनों को
उठ अंकुरित होने की
कोई वजह दो
करवटों में सिमटे हुए गगन को
उड़ान के लिए
थोड़ा विस्तार दो
समझ की गाँठ में उलझी
हर समझ को
मासूमियत की इज़ाजत ही दे दो
पलक पर रुकी
पुतलियों में थमे सैलाब को
कहीं कोई रास्ता दे दो
दरारों पर मलहम लगाकर
भूकंप को टालने का दिलासा छोड़ दो

उनमुक्त मन को स्पंदित किए स्पर्श को
ना नाम दो, अंजाम दो
बस.....
सही और गलत के पाखंड के बीच
अमल की सँभावना कहीं हो
और....
ब्रह्माण्ड़ में ब्रह्म के,सत्य के सामने
समर्पण कभी ना कभी हो.....

10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बेजी!
इस कविता को पढ़ कर मन पूरा भीग गया।
इस कविता को व्याख्यायित किया है अपने एक दोस्त को।
लगता है आप की दार्शनिक समझ की दिशा वही है जो मेरी भी है।

Udan Tashtari said...

ब्रह्माण्ड़ में ब्रह्म के,सत्य के सामने
समर्पण कभी ना कभी हो....

-बहुत गहन!! बेहतरीन उम्दा रचना!

प्रवीण पाण्डेय said...

करवटों में सिमटे हुए गगन को
उड़ान के लिए
थोड़ा विस्तार दो

आपकी हर करवटों पर एक नया गगन है,
जो शब्द जहाँ उतरा, वो वहीं मगन है ।

डॉ .अनुराग said...

कोई वजह दो
करवटों में सिमटे हुए गगन को
उड़ान के लिए
थोड़ा विस्तार दो
समझ की गाँठ में उलझी
हर समझ को


अद्भुत.....हिंदी ओर अंग्रेजी में खुद को इतने बेहतर तरीके से एक्सप्रेस करना .....ऐसा विलक्षण गुण मैंने बहुत कम लोगो के भीतर देखा है ....आप में शायद इन बिल्ट है...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

achhi rachna, sirf yahi kahu to baat me maza nahi aayega, kyoki jis soch liye yah rachna he vo andhere me kisi roshan manzil ke hone aur use paa jane ki raah deti he..
ब्रह्माण्ड़ में ब्रह्म के,सत्य के सामने
समर्पण कभी ना कभी हो.....
yah ummid insaaan ki antim aour sachchi safalta bhi hogi.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी कविता पढकर नयेपन का आभास हुआ!
ऐसे ही भाव-तरंगनी प्रवाहित करती रहें!

अर्चना said...

bahut,bahut khoobasoorat rachana.

Ravindra Ravi said...

बहुत सुंदर.!!!!

K.P.Chauhan said...

aapke dwaaraa rachit is kawitaa ko padhkar hrday ki kyaa gati hui main shabdon me vyakt nahi kar saktaa bahut dino ke baad ek achchhi kawitri se khatokitaabat hui ishwar kare aap aise hi likhti rahen
kabhi hamaare blog par bhi nigaah maaren usmen main mere apne or sampoorn sansaar kaa avlokan karen

sandeepharyanvi said...

achcha hai sahab!!!!