Tuesday, April 20, 2010

कहाँ गये...













हिसाब तो करना होगा
अभी नहीं तो थोड़ी देर में
वह सब उजाले जो जमा थे
कहाँ गये ?
सँभाले हुए जन्म जन्मांतर
बिखरे,जले और खप गये
कहाँ गये ?

ना जाने वो कौन से
धुप्प अँधेरे थे
सन्नाटें जिनसे
विलाप उठता था
सारी रौशनी औ आवाज़
निगल गये
कहाँ गये ?

फख्र था
जिन चरागों की लौ की
आग पर
रास्ते भूले पड़े ढूँढे कभी
खुद आग में ही
क्या भस्म हो गये ?
कहाँ गये ?

आज ढूँढता है मन
टुकड़ा कोई
जो ढँक सके
रौशनी से अँधेरा पड़ा
इक कोना है सायों से भरा

पर
टिमटिमाती लौ कहीं दूर है...
पास की आग शायद बुझ गई

photo credit- Firestorm-Peter Shor

10 comments:

M VERMA said...

टिमटिमाती लौ कहीं दूर है...
यह टिमटिमाहट है तो रोशनी की आस भे है
सुन्दर कविता

पारूल said...
This comment has been removed by the author.
दिलीप said...

sundar kavita ujaale to bas ab munh chipa ke rote hain...andheron ka jamana hai...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

Shekhar Kumawat said...

bahut khub

jabardast he

shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

पारूल said...

बेजी को पढ़कर अच्छा लगता है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

संकट यही है कि
पास की आग बुझ चुकी है।
.... उसे फिर से जलाना होगा
हिसाब तो करना होगा

neelima sukhija arora said...

बेजी, आपके ब्लाग पर आना हमेशा ही सुखद होता है, शब्दों की गर्माहट आज भी बरकरार है, जैसे सालों पहले थी। पर बहुत वक्त बाद आपके ब्लाग पर आने के लिए सारी :-) काश, कान पकड़ने वाला स्माइली भी होता

अपूर्व said...

हमारे वक्त की तमाम तल्खियाँ, तमाम अविश्वास, तमाम सवालात्‌ सब उभर के आते हैं आपकी इस कविता मे..मगर अंधेरे कितने भी ताकतवर क्यों न हों, रोशनी कितनी भी दूर क्यों न हो..अंदर की आग मद्धम नही होनी चाहिये..और उम्मीद का एक दिया टिमटिमाता रहे अंधेरे की सत्ता के मुकाबिल..
बेहद खूबसूरत कविताएं है आपके ब्लॉग पर..शुभकामनाएं आपकी कलम के लिये

डॉ .अनुराग said...

आज ढूँढता है मन
टुकड़ा कोई
जो ढँक सके
रौशनी से अँधेरा पड़ा
इक कोना है सायों से भरा

पर
टिमटिमाती लौ कहीं दूर है...
पास की आग शायद बुझ गई

again a master stroke.....typical "beji"andaj.....

जोशिम said...

बहुत उम्दा अकेला लिखा है - ऐसे ही सवाल होते है