Friday, April 23, 2010

आहत













उनमुक्त उड़ान को
हक से
काबू में कर
स्वत्व रख
अभिभूत कर
मुट्ठी में भर
कहते हो
एक बार उड़ के तो दिखा


बताओ
रंग झड़ी तितली भी
कभी उड़ान भरती है??!

17 comments:

Suman said...

nice

विजयप्रकाश said...

साधुवाद...बहुत गहरी बात कह दी.

पारूल said...

फिर भी नायिका गाती घूमती है -"कितना सुख है बंधन में " :)

बहुत सुन्दर बात कही बेजी

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर सहज कविता!

M VERMA said...

बताओ
रंग झड़ी तितली भी
कभी उड़ान भरती है??!
उफ ! क्या कह दिया
त्रासद, शोर करती हुई दिल में उतर गयी रचना. उम्दा -- बहुत उम्दा

प्रवीण पाण्डेय said...

कुछ कह गयी कविता एक झटके में कि स्तब्ध रह गये विचार ।

दिलीप said...

bahut sundar...

अमिताभ मीत said...

Badhiya !!

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर भाव!!

आशीष/ ASHISH said...

Pain encapsulated beautifully!

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भाव!

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ said...

क्या बात है आपके क्या कहने
दोनों रचनायें बेहद भावपूर्ण
है नारी ह्रदय की कोमलता अलग ही
होती है वास्तव में नारी और प्रकृति
एक ही है इसलिये उसके चिंतन
में लाजवाव प्रकृति का समावेश हो ही
जाता है..पर इसमें आत्मग्यान
का जुङाव होने से और अधिक
प्रभाव पैदा हो जाता है
satguru-satykikhoj.blogspot.com

Vinay Prajapati said...

Very beautiful

happy birthday to you

nilesh mathur said...

आज आपकी कई रचनाएँ पढ़ी, आपकी रचनाओं में एक अलग अंदाज है, पढ़कर अच्छा लगा, और आपका प्रोफाइल फोटो तो कमाल का है!

sunita said...

adhbhut

Karishma said...

I liked your blog...

Avinash Chandra said...

behad khubsurat