
किसी कल्पना के गर्भ में
संकल्प की तरह
संभावनाओं की तरह
अंक से जुड़े
प्रयोजन
मात्र सींचना
ना उद्देश्य,
ना किसी अन्य लक्ष्य हेतु
पँख जो अब बन गए
तैयार हैं
बस वो आसमाँ नहीं मेरे पास में
यह जहाँ पर खुल सकें
कुलबुला कर छटपटाना
तेरी हरकत मेरी छाती पर है
इंतज़ार मुझको भी तेरे
छोड़ कर जाने का है
पृथक होना
मेरी मर्जी ना मेरी चाह है
पर नियती में तुम्हारे
ऊँची और उड़ान है
ना सार मेरे पास में
तत्व सब तुमको दिए
स्वायत उड़ान जो भर सको
याद बस इतना रखो
तेरे जाने के बाद में
खोखली सी छाल है
और
अंक में रची बसी
भीनी सी तेरी याद है




8 comments:
अंक में रची बसी
भीनी सी तेरी याद है
बहुत सुन्दर रचना, उड़ान कितनी भी ऊँची हो पर नीड़ तक लौटना ही पड़ता है
waah! bahut sundar!
बहुत सुंदर कविता है।
इन दिनों आप बहुत बहुत दिनों बाद आ रही हैं। आप को मिस करते हैं पाठक।
nice
मर्मस्पर्शी संवेदन है आपका । सुन्दर अभिव्यक्ति भी ।
बहुत सुन्दर रचना
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बहुत सुंदर कविता... शब्द चयन में विशेष. विचार प्रधान व प्रवाहमान. बहुत कम ऐसी सुंदर कविताएं पढ़ने को मिलती हैं... अधिकांश में या तो रोना- धोना मिलता है और बाक़ी में नक़ली रोमांस मुड़े-तुड़े काग़ज़ के फूलों से ख़ुशबू निकालने की कोशिश का सा...
केवल ठेठ शब्दचयन.
अगर ब्लाग शीर्षक कठपुतलियां है तो अंग्रेज़ी में kath... होना चाहिये h न रहने से इसे कटपुतलियां पढ़ा जाता है..
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