Saturday, May 15, 2010

ककून














किसी कल्पना के गर्भ में
संकल्प की तरह
संभावनाओं की तरह
अंक से जुड़े
प्रयोजन
मात्र सींचना
ना उद्देश्य,
ना किसी अन्य लक्ष्य हेतु
पँख जो अब बन गए
तैयार हैं
बस वो आसमाँ नहीं मेरे पास में
यह जहाँ पर खुल सकें
कुलबुला कर छटपटाना
तेरी हरकत मेरी छाती पर है
इंतज़ार मुझको भी तेरे
छोड़ कर जाने का है
पृथक होना
मेरी मर्जी ना मेरी चाह है
पर नियती में तुम्हारे
ऊँची और उड़ान है
ना सार मेरे पास में
तत्व सब तुमको दिए
स्वायत उड़ान जो भर सको
याद बस इतना रखो
तेरे जाने के बाद में
खोखली सी छाल है
और
अंक में रची बसी
भीनी सी तेरी याद है

8 comments:

M VERMA said...

अंक में रची बसी
भीनी सी तेरी याद है
बहुत सुन्दर रचना, उड़ान कितनी भी ऊँची हो पर नीड़ तक लौटना ही पड़ता है

nilesh mathur said...

waah! bahut sundar!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुंदर कविता है।
इन दिनों आप बहुत बहुत दिनों बाद आ रही हैं। आप को मिस करते हैं पाठक।

Pawan Kumar said...

nice

प्रवीण पाण्डेय said...

मर्मस्पर्शी संवेदन है आपका । सुन्दर अभिव्यक्ति भी ।

deepakchaubey said...

बहुत सुन्दर रचना

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काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत सुंदर कविता... शब्द चयन में विशेष. विचार प्रधान व प्रवाहमान. बहुत कम ऐसी सुंदर कविताएं पढ़ने को मिलती हैं... अधिकांश में या तो रोना- धोना मिलता है और बाक़ी में नक़ली रोमांस मुड़े-तुड़े काग़ज़ के फूलों से ख़ुशबू निकालने की कोशिश का सा...
केवल ठेठ शब्दचयन.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अगर ब्लाग शीर्षक कठपुतलियां है तो अंग्रेज़ी में kath... होना चाहिये h न रहने से इसे कटपुतलियां पढ़ा जाता है..