Sunday, July 04, 2010

अनवरत















मुझे यकीन है
तुम कहीं दूर नहीं गये
पास ही हो
मैने देखा है तुम्हे
आज भी
माँ के साथ खड़े
फिर भी ना जाने क्यूँ
तस्वीर देख तड़प जाता है मन
जैसे तुम ना होकर बस परछाई हो कोई
ऐसा लगता है कोई दीवार सी है
पास होकर भी कहीं दूर हो तुम
वैसे तो सब खैरियत से है
पिछवाड़े में धान की फसल
भी तैयार होने को है
रात को किवाड़ सब मैं ही देख लेती हूँ
माँ भी देर सबेर सो ही जाती हैं
पर....
तुम्हारी आवाज़ सुनने का मन करता है
तुम्हे छूने को तरस जाती हूँ.....
....
कभी सपने में ही आ जाया करो
अपनी आवाज़ में नाम से मुझे पुकारा करो

..............................
आखरी साँस में छाती से लगी थी जब मैं
तेरे सीने की गरमी से लौ सी जली थी जब मैं
उस आग को ना बुझने देना.....
मेरे अंदर मेरी साँसों में चलते रहना........




28 मई 2010 को पापा हमारे बीच से चले गये।

7 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पापा को भावभीनी श्रद्धांजलि!
पिछले दिनों नैट से ओझल रहने का कारण मिला।

डॉ .अनुराग said...

speechless!

कंचन सिंह चौहान said...

खूब तो नही ही कहा जा सकता इस भीगी ससंवेदना के बाद... महसूस कर रही हूँ बहुत भीतर तक...!

prabha said...

आपके मन की तड़पन समझ सकती हूँ,ये वेदना तो बरसों अनवरत साथ निभाती है,कसना पड़ता है मन को। निश्चय ही पापा आपके पास हैं।सम्भालिए अपने को तो वो खुश होंगे,आपको भी कुछ राहत मिलेगी।
उनकी आत्मा को शान्ति मिले यही ईश्वर से प्रार्थना है।

अपूर्व said...

इसे कविता कहना या प्रशंसा करना न्याय नही होगा इस कविता की भावना के साथ..हमारे अपने साअथ छोड़ जाते हैं..जिंदगी चलती रहती है..फ़सलें पकती रहती हैं..दिन रातों मे और रातें दिन मे तब्दील होती रहती हैं..साँसे आग सी जलती रहती हैं..और यह आस भी एक उ्म्मीद बन कर धड़कती रहती है..कि कहीं किसी मोड़ पर कोई आवाज दे कर फिर से पुकार लेगा...मगर हमारे अपने कभी हमारी जिंदगी से दूर जाते नहीं हैं..वे हमारी स्मृतियों मे जीवित रहते हैं..हमारी नसों मे धड़कते रहते हैं..उनका हमारे हर लम्हे मे साथ होना हमारी साँसों मे घुला होना ही हमारे उन रिश्तों के शाश्वत्य की निशानी होता है...
पिता जी की आत्मा को हार्दिक श्रद्धाँजलि..

आकाश: said...

कैसी बिडम्बना है कि मैं अभी अपनी मां को याद कर रहा था कि आपके ब्लाग पर आ पहुंचा. मेरी मां को बिछुङे तीन साल हो गये लेकिन अभी भी मन वास्तविकता स्वीकार करने को तैयार नही. लगता है शायद मै कोई डरावना सपना देख रहा हूं. बस जैसे ही घर लौटूंगा, मां मुझे देहरी पर मेरा इन्तजार करती मिलेगी और मै उससे चिपट जाऊगा.

आपके पापा को मेरी और से भावभीनी श्रद्धांजलि..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ओह ,

कितनी संवेदनशीलता से लिखा है ...हर उस बेटी का दर्द उकेर दिया है जिसने अपने पिता को खो दिया है ...