
तुम उजाले का एक सिरा
और मैं दूसरा थाम
जलते हैं
चलते हैं
मैं तुम्हारी रूह को
महसूस करती हूँ
तुम मेरी तपिश में पिघलते हो
पवन के लय में गूँजता है
हमारा मूक संगीत
चमकती,दमकती,
दहकती,धधकती
नृत्य करती है रौशनी
मैं साँसों में संवरती हूँ
महक पहन संवरती हूँ
.....
तुम्हारे लिए
जिस्म पहनती हूँ...
तुम हाथों से
शिल्प रचते हो
उँगलियों के पोर के नीचे
मैं उभरती हूँ...
मैं तुम्हे नाम देती हूँ
तुम मुझे स्पर्श....
मैं आवाज बनती हूँ
तुम कर्ण...
तुम्हारी लौ
पवन की तार पर
तरंग सी छेड़ती है सरगम
आरोह,अवरोह
ताल,लय,सुर....
सुरभि....
......
बुझती,जलती
मैं तुम्हारे साथ
भस्म होती हूँ
तुम मुझ में
मैं तुम्हारे उजालों सी
जलती हूँ...




9 comments:
शानदार पोस्ट
भावनाओं की कोमल अभिव्यक्ति। प्रतीकों से कहीं अधिक मुखर हो उभरा है, प्रतीकों का संवाद।
बहुत सुन्दर रचना।
बेजी जी बहुत सुन्दर कृति है
अनुपम रचना..परस्पर विलीन हो कर स्वयं समिधा बन कर इस यज्ञ को पूर्ण करने की कामना से ओतप्रोत!!
लौ की तरह थिरकती सी खूबसूरत कविता मन के कितने अछूते रंगों में रंगी हुई है...
waah...
kuch achcha hi nahi bahut achcha likhti hain. lekin saral sabd humare dil me utar jate to achcha hota.
तुम्हारे लिए
जिस्म पहनती हूँ...
तुम हाथों से
शिल्प रचते हो
उँगलियों के पोर के नीचे
मैं उभरती हूँ...
बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं भावनाओं को ...
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