Thursday, July 15, 2010

सिंफ़नी









तुम उजाले का एक सिरा
और मैं दूसरा थाम
जलते हैं
चलते हैं
मैं तुम्हारी रूह को
महसूस करती हूँ
तुम मेरी तपिश में पिघलते हो
पवन के लय में गूँजता है
हमारा मूक संगीत
चमकती,दमकती,
दहकती,धधकती
नृत्य करती है रौशनी
मैं साँसों में संवरती हूँ
महक पहन संवरती हूँ
.....
तुम्हारे लिए
जिस्म पहनती हूँ...
तुम हाथों से
शिल्प रचते हो
उँगलियों के पोर के नीचे
मैं उभरती हूँ...
मैं तुम्हे नाम देती हूँ
तुम मुझे स्पर्श....
मैं आवाज बनती हूँ
तुम कर्ण...

तुम्हारी लौ
पवन की तार पर
तरंग सी छेड़ती है सरगम
आरोह,अवरोह
ताल,लय,सुर....
सुरभि....
......

बुझती,जलती
मैं तुम्हारे साथ
भस्म होती हूँ
तुम मुझ में
मैं तुम्हारे उजालों सी
जलती हूँ...

9 comments:

Jandunia said...

शानदार पोस्ट

प्रवीण पाण्डेय said...

भावनाओं की कोमल अभिव्यक्ति। प्रतीकों से कहीं अधिक मुखर हो उभरा है, प्रतीकों का संवाद।

वन्दना said...

बहुत सुन्दर रचना।

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

बेजी जी बहुत सुन्दर कृति है

अपूर्व said...

अनुपम रचना..परस्पर विलीन हो कर स्वयं समिधा बन कर इस यज्ञ को पूर्ण करने की कामना से ओतप्रोत!!

dimple said...

लौ की तरह थिरकती सी खूबसूरत कविता मन के कितने अछूते रंगों में रंगी हुई है...

पथिक.... said...

waah...

alok said...

kuch achcha hi nahi bahut achcha likhti hain. lekin saral sabd humare dil me utar jate to achcha hota.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

तुम्हारे लिए
जिस्म पहनती हूँ...
तुम हाथों से
शिल्प रचते हो
उँगलियों के पोर के नीचे
मैं उभरती हूँ...

बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं भावनाओं को ...