Sunday, October 10, 2010

इंगित















चेतना
हर रोज़
प्रत्यक्ष ज्ञान के पासे
खेलती है
अवचेतन मन
लाचार सा सबूत
तलाशता है
.......
साबित करना तो
मुमकिन नहीं...
पर अलख साये
अक्सर...
दम घोंटते हैं......

1 comments:

shikha varshney said...

न जाने क्या क्या कह दिया अपने इन चंद पंक्तियों में .गहरे उतरी है रचना.