
जब साये भी सायों से लंबे होने लगे
उजालों को ग्रहण जब लगने लगे
आस भी आस्था को बो ना सके
शब्द अर्थ को, अर्थ भी आत्मा को खोने लगे
क्षितिज पर जो सूरज छिपने लगे
उजाले अँधेरों में खोने लगे.....
तब...
तेरे पास मैं...तेरे साथ भी
तेरे आस की बनूँ रौशनी
ज़रा सी फिकर से फिकर दूर हो...
मेरे जागने से आराम हो....
हो हौसला उन्हीं ख्वाबों से फिर
निराशा से ऐसे जगा मैं सकूँ....
आगोश में फूटकर रो सको
साथ रोने से हँसने की वजह कुछ मिले...
मेरे स्नेह में हो इतनी लगन
माँग लूँ जो दुआ होकर मगन....
आँख मल कर
उजाले भी जगने लगे
सारे साये भी रौशनी में
जल कर बुझें......




5 comments:
आमीन
बहुत सुन्दर और भावुक कविता है
6.5/10
बेहतरीन
उत्कृष्ट कविता के सभी गुण
पठनीय
बहुत सुन्दर्।
बुझ कर जलें ?...
aaj aapki kavitaon ki galiyon mein pahli baar aana hua ..charcha manch pe aapki kavita ka link tha ,kavita mein kashish thii jo blog ki or bhi kavitayon tak le aayi ..yakinan aapke lekhan se man khush hua
gahre or sarthak bhaav ,acche tarashe hue shabdon mein daad ki haqdaar hai aap ..daad hazir hai man se kubool karen
maaa sarasvati aapki kalam ko or roshan kare
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