
जब कहा
जलो, साबित करो
निर्दोष मन....
और निर्मल तन
तब बता जानकी,
तुझको कैसा लगा.....?
क्या याद आये
विरह के दिन
जो रो कर दुआ माँगने में कटे?
क्या तरसा अंतरंग
रंज से भरा
नये हुए दर्द सब जो घटे?
क्या राम
से तुम हताश हुई
या विश्वास में वे उतरे खरे?
काम और कर्तव्य
के बीच में
क्या नेह के अभाव तुमको खले?
ऐसे कैसे
प्रणय में बँधी थी हुई...
स्नेह,निष्ठा,साबुत लटें.....?
बता जानकी
क्या ना आहत हुई...
जब तेरे स्नेह को
राम परखने लगे...?
अग्नि में क्यों
दहन ना हुई...
लपटें क्या
आँसुओं से बुझी....?




10 comments:
शाश्वत प्रश्न्।
7/10
बेहतरीन-बेहतरीन-बेहतरीन
ऐसी रचना जिसे पढ़कर अंतर्मन ठहर सा जाता है.
संग्रहणीय पोस्ट
राम के स्नेह को सत्यता पर खरा उतार दिया, इससे परे और क्या परीक्षा होगी नारीमन की।
बाल्मीकि रामायण पढ़ रही हूँ और सीता का ये कहना कि "आपने मुझे सामान्य महिलाओं में गिन लिया.... क्या आपको अपने बालपन का वह प्रेम भूल गया, जब मुझमें सिर्फ अच्छाइयाँ दिखती थीं....!"
ऐसा लगा कि कितना कॉमन सा वाक्य है जो हर समर्पित नारी के मुँह से निकलता है, जब उसे अपने सारे समर्पण के बाद भी प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। मगर कितनी पीड़ा होती है मन से मुख तक आने इन वाक्यों को.....!!!!!!!!!
एक अरसे बाद आया हूँ आपके ब्लॉग पर और देखो तो बहुत अच्छा पढ़कर जा रहा हूँ
सुन्दर रचना
सीता की विवशता को बखूबी उकेरा है
अनुत्तरित प्रश्न
बहुत बढ़िया!
इस घटना के पीछे जो भी कारण रहा हो क्योंकि मर्यादा पुरुषोत्तम अकारण कोई ऐसा काम नहीं कर सकते थे परंतु
ये भी सच है कि नारी मन आहत हुआ ,सीता जी की उम्र भर की वफ़ादारी पर सवाल??????
यदि हम symbolize करें तो नारी तो अपनी परीक्षा में सफल हो गई लेकिन क्या पुरुष अपनी ग़लती का एहसास कर पाया??
कुछ सवालों के जवाब आने बाक़ी हैं अभी भे
भावों की बहुत उम्दा अभिव्यक्ति, बधाई
यहाँ आना ही था, पढना ही था, और रोम रोम से महसूस कर लिखना ही था...
शुक्रिया आपका जो आपने यूँ लिखा
ये अनुत्तरित प्रश्न हमेशा से ही अंतर्मन को मथते रहे हैं. सीता की वेदना और व्यथा को दर्शाती दिल की गहराईयों को छूने वाली बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति. आभार.
सादर
डोरोथी.
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