1.
लहर लहर
पहर पहर
कशाकशी,खलबली
जो कविता गुँथ रही
वही कहीं बिखर गई
2
वो भाव
जले सिके हुए
गरम थे
जब सील गए
परोसती कैसे ?
3.
तुम्हारी खुली आँखों के सपने
मैने चुपके से देखे थे
लिखती तो
चोरी पकड़ ना लेते तुम ?
4.
हर रुसवाई ने
कसम ली है मुझसे
ऐसी कोई बात ना कहूँ
कि तुम रो पड़ो
5.
शंका और आशंका से
बुन रही थी हौसला
शेष कुछ रहा नहीं
जो कोई नज़्म बन सके
6.
आदिम मुफलिसी
का अनुवाद
विकसित लिपी में
मुमकिन ना था....
7.
हलक पर आकर
ना जाने क्यों सैलाब रुका था
अजब थी बात
पर फिर भी
साहिल ना भीगा था....
8.
तूफाँ में फँसे घोंसले में
मुझे नज़्म.... चूजों सी मिली...
शब्द से छूने से डरती थी
इसके अपने कहीं तज ना दें...
9.
नहीं थी हिमाकत इतनी
कि आत्मा के रंग का
नाम लिख दूँ
जिसे देखा नहीं, ना बूझा हो...
उसे पर्याय लिख दूँ .....
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20 comments:
सुन्दर रचना है!
सभी शब्दचित्र बढ़िया है!
--
प्रेम से करना "गजानन-लक्ष्मी" आराधना।
आज होनी चाहिए "माँ शारदे" की साधना।।
अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।
आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!
किन पंक्तियों की तारीफ करुण समझ नहीं पा रही हूँ .सब एक दूसरे पर भारी हैं.
सभी क्षनिकाएं बहुत खूबसूरती से लिखी हैं ....
दीपावली की शुभकामनायें
बहुत सुन्दर! बेहतरीन क्षणिकाएँ!
आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामना!
बड़ी सुन्दर कविता है, क्षणिकायें आपस में गुथी हुयी।
हलक पर आकर
ना जाने क्यों सैलाब रुका था
अजब थी बात
पर फिर भी
साहिल ना भीगा था....
तूफाँ में फँसे घोंसले में
मुझे नज़्म.... चूजों सी मिली...
शब्द से छूने से डरती थी
इसके अपने कहीं तज ना दें...
bahut khoobsoorat likha hai ..
Deepavali mubarak ho ..
दिल की गहराईयों को छूने वाली एक खूबसूरत, संवेदनशील प्रस्तुति. आभार.
इस ज्योति पर्व का उजास
जगमगाता रहे आप में जीवन भर
दीपमालिका की अनगिन पांती
आलोकित करे पथ आपका पल पल
मंगलमय कल्याणकारी हो आगामी वर्ष
सुख समृद्धि शांति उल्लास की
आशीष वृष्टि करे आप पर, आपके प्रियजनों पर
आपको सपरिवार दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं.
सादर
डोरोथी.
सुन्दर रचना है.......दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।
वाह वाह ……………बेहतरीन्……………एक से बढकर एक ………………दिल मे उतर गयीं।
आदिम मुफलिसी
का अनुवाद
विकसित लिपी में
मुमकिन ना था....
bahut sateek!!!
poori post uttam hai!
anlikha hi shreshth hota hai!
shubhkamnayen!
वो भाव
जले सिके हुए
गरम थे
जब सील गए
परोसती कैसे ?-bahut sundar. aise sabhi kshanikayen bahut sundar hain, badhai.
वो भाव
जले सिके हुए
गरम थे
जब सील गए
परोसती कैसे ?-bahut hi achchhi hain sari kshanikayen. badhai.
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 09-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया
adbhut rachana.....jawab nahi
वाह !! क्या बात है .... क्या अंदाज़ लिखने का ... बहुत खूब ...
भावपूर्ण क्षणिकाएं!
बड़ी सुन्दर क्षणिकायें है,एक से बढकर एक.
सभी क्षनिकाएं बहुत खूबसूरती से लिखी हैं ....
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!
तुम्हारी खुली आँखों के सपने
मैने चुपके से देखे थे
लिखती तो
चोरी पकड़ ना लेते तुम ...
बहुत मासूम ... सब क्षणिकाएं लाजवाब हैं ... वाह वाह निकल अत है अपने आप ....
हलक पर आकर
ना जाने क्यों सैलाब रुका था
अजब थी बात
पर फिर भी
साहिल ना भीगा था....
सभी क्षणिकाएं लाजवाब और मर्मस्पर्शी हैं..बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति..आभार
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