Thursday, November 04, 2010

वो कविता जो नहीं लिखी

1.
लहर लहर
पहर पहर
कशाकशी,खलबली
जो कविता गुँथ रही
वही कहीं बिखर गई

2
वो भाव
जले सिके हुए
गरम थे
जब सील गए
परोसती कैसे ?

3.
तुम्हारी खुली आँखों के सपने
मैने चुपके से देखे थे
लिखती तो
चोरी पकड़ ना लेते तुम ?

4.
हर रुसवाई ने
कसम ली है मुझसे
ऐसी कोई बात ना कहूँ
कि तुम रो पड़ो

5.
शंका और आशंका से
बुन रही थी हौसला
शेष कुछ रहा नहीं
जो कोई नज़्म बन सके

6.
आदिम मुफलिसी
का अनुवाद
विकसित लिपी में
मुमकिन ना था....


7.
हलक पर आकर
ना जाने क्यों सैलाब रुका था
अजब थी बात
पर फिर भी
साहिल ना भीगा था....

8.
तूफाँ में फँसे घोंसले में
मुझे नज़्म.... चूजों सी मिली...
शब्द से छूने से डरती थी
इसके अपने कहीं तज ना दें...

9.
नहीं थी हिमाकत इतनी
कि आत्मा के रंग का
नाम लिख दूँ
जिसे देखा नहीं, ना बूझा हो...
उसे पर्याय लिख दूँ .....

20 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्दर रचना है!
सभी शब्दचित्र बढ़िया है!
--
प्रेम से करना "गजानन-लक्ष्मी" आराधना।
आज होनी चाहिए "माँ शारदे" की साधना।।

अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।

आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

shikha varshney said...

किन पंक्तियों की तारीफ करुण समझ नहीं पा रही हूँ .सब एक दूसरे पर भारी हैं.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सभी क्षनिकाएं बहुत खूबसूरती से लिखी हैं ....


दीपावली की शुभकामनायें

nilesh mathur said...

बहुत सुन्दर! बेहतरीन क्षणिकाएँ!
आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामना!

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी सुन्दर कविता है, क्षणिकायें आपस में गुथी हुयी।

शारदा अरोरा said...

हलक पर आकर
ना जाने क्यों सैलाब रुका था
अजब थी बात
पर फिर भी
साहिल ना भीगा था....

तूफाँ में फँसे घोंसले में
मुझे नज़्म.... चूजों सी मिली...
शब्द से छूने से डरती थी
इसके अपने कहीं तज ना दें...
bahut khoobsoorat likha hai ..
Deepavali mubarak ho ..

Dorothy said...

दिल की गहराईयों को छूने वाली एक खूबसूरत, संवेदनशील प्रस्तुति. आभार.

इस ज्योति पर्व का उजास
जगमगाता रहे आप में जीवन भर
दीपमालिका की अनगिन पांती
आलोकित करे पथ आपका पल पल
मंगलमय कल्याणकारी हो आगामी वर्ष
सुख समृद्धि शांति उल्लास की
आशीष वृष्टि करे आप पर, आपके प्रियजनों पर

आपको सपरिवार दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं.
सादर
डोरोथी.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुन्दर रचना है.......दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।

वन्दना said...

वाह वाह ……………बेहतरीन्……………एक से बढकर एक ………………दिल मे उतर गयीं।

अनुपमा पाठक said...

आदिम मुफलिसी
का अनुवाद
विकसित लिपी में
मुमकिन ना था....
bahut sateek!!!

poori post uttam hai!
anlikha hi shreshth hota hai!
shubhkamnayen!

अर्चना said...

वो भाव
जले सिके हुए
गरम थे
जब सील गए
परोसती कैसे ?-bahut sundar. aise sabhi kshanikayen bahut sundar hain, badhai.

अर्चना said...

वो भाव
जले सिके हुए
गरम थे
जब सील गए
परोसती कैसे ?-bahut hi achchhi hain sari kshanikayen. badhai.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 09-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

ana said...

adbhut rachana.....jawab nahi

क्षितिजा .... said...

वाह !! क्या बात है .... क्या अंदाज़ लिखने का ... बहुत खूब ...

यश(वन्त) said...

भावपूर्ण क्षणिकाएं!

रचना दीक्षित said...

बड़ी सुन्दर क्षणिकायें है,एक से बढकर एक.

कविता रावत said...

सभी क्षनिकाएं बहुत खूबसूरती से लिखी हैं ....
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

दिगम्बर नासवा said...

तुम्हारी खुली आँखों के सपने
मैने चुपके से देखे थे
लिखती तो
चोरी पकड़ ना लेते तुम ...

बहुत मासूम ... सब क्षणिकाएं लाजवाब हैं ... वाह वाह निकल अत है अपने आप ....

Kailash C Sharma said...

हलक पर आकर
ना जाने क्यों सैलाब रुका था
अजब थी बात
पर फिर भी
साहिल ना भीगा था....

सभी क्षणिकाएं लाजवाब और मर्मस्पर्शी हैं..बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति..आभार