1.
लहर लहर
पहर पहर
कशाकशी,खलबली
जो कविता गुँथ रही
वही कहीं बिखर गई
2
वो भाव
जले सिके हुए
गरम थे
जब सील गए
परोसती कैसे ?
3.
तुम्हारी खुली आँखों के सपने
मैने चुपके से देखे थे
लिखती तो
चोरी पकड़ ना लेते तुम ?
4.
हर रुसवाई ने
कसम ली है मुझसे
ऐसी कोई बात ना कहूँ
कि तुम रो पड़ो
5.
शंका और आशंका से
बुन रही थी हौसला
शेष कुछ रहा नहीं
जो कोई नज़्म बन सके
6.
आदिम मुफलिसी
का अनुवाद
विकसित लिपी में
मुमकिन ना था....
7.
हलक पर आकर
ना जाने क्यों सैलाब रुका था
अजब थी बात
पर फिर भी
साहिल ना भीगा था....
8.
तूफाँ में फँसे घोंसले में
मुझे नज़्म.... चूजों सी मिली...
शब्द से छूने से डरती थी
इसके अपने कहीं तज ना दें...
9.
नहीं थी हिमाकत इतनी
कि आत्मा के रंग का
नाम लिख दूँ
जिसे देखा नहीं, ना बूझा हो...
उसे पर्याय लिख दूँ .....
Thursday, November 04, 2010
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