Monday, January 03, 2011

स्वाभाविक














समय का स्वभाव था
सो गुजर गया
सूरज कभी चढ़ा था
फिर उतर गया
यह भावुकता का विषय नहीं
तथ्य है
नैसर्गिक
चिर निरंतर का सच

कहते हैं
गुजरा समय लौटा नहीं करता
पर फिर भी
लगता है यूँ कि
यह उभरता है
जैसे जलते कागज़ पर
अक्षर साफ होते हैं
पुराने खाने का स्वाद
खट्टी डकार में
उठता है
तस्वीर की झुर्रियाँ भी
हँसती प्रतीत होती है
आवाज़ सुनाई नहीं देती
पर उसका जायका
जीभ में घुलता है
कहीं किसी लिखाई के जाने पहचाने
तिरछेपन से
समय लड़खड़ा जाता है

अपने ही स्वभाव से मजबूर
समय बीतता जाता है
खुद अपने सीने पर
परत दर परत
नयी कहानियाँ रख कर
उसके नीचे दबता है
................
पत्ते उतर जाते हैं
फिर भारी बरफ के भीतर
जमकर दफ्न होते हैं
सम्मूर्छित
निष्क्रिय

समय बीतता है
गुजरता है
और बीता हुआ समय
फिर अनुकूल होता है
कोंपल फूटते हैं
फूल लगते हैं
इतिहास फिर
खुद को दोहराता है….

...
यह भावुकता का विषय नहीं
तथ्य है ....
कि इस बीच जीवन
गुजर जाता है....

13 comments:

shikha varshney said...

और बीता हुआ समय
फिर अनुकूल होता है
कोंपल फूटते हैं
फूल लगते हैं
इतिहास फिर
खुद को दोहराता है…
सच...और यही सत्य हमें जोड़े रखता है अपनी जमीन से और अग्रसर करता है सही मार्ग पर.
बेहतरीन अभिव्यक्ति.

वन्दना said...

सच कहा इस बीच जीवन गुजर जाता है …………सब अपने आप होता रहता है। सुन्दर प्रस्तुति।

संजय भास्कर said...

नमस्कार !
..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

संजय भास्कर said...

वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.
खुशियों भरा हो साल नया आपके लिए

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

bhavpoorn,sundar rachna.
abhivyakti ati sundar.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

bhavpoorn,sundar rachna.
abhivyakti ati sundar.

वाणी गीत said...

यह भावुकता का विषय नहीं ...इतिहास खुद को दोहराता है और इस समय से उस समय के बीच एक जीवन गुजर जाता है ...
जीवन के दार्शनिक पक्ष पर अच्छी कविता !

रंजना said...

सत्य कहा...

कोंपल से मिट्टी में मिलने और फिर खिलने तक की कथा ही तो जीवन है...

गहन चिंतन,सुन्दर भाव और मोहक अभिव्यक्ति ....

अति सुन्दर रचना...

अनुपमा पाठक said...

सुन्दर प्रस्तुति!

mridula pradhan said...

itni badi sachchayee se awgat karba diya hamen.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत अच्छी लगी आपकी कविता.

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

समय बीतता है
गुजरता है
और बीता हुआ समय
फिर अनुकूल होता है
कोंपल फूटते हैं
फूल लगते हैं
इतिहास फिर
खुद को दोहराता है….


यूँ ही चलता रहता है जीवन निरंतर

prerna argal said...

main aapke blog main pahali baar aai hoon.bahut achcha bhavpoorn,gaharaa likhtin hain aap.dil ko choo gai aapki rachanaa.badhaai sweekaren.




please visit my blog.thanks