Monday, April 18, 2011

मैं घर लौटना चाहती हूँ

एसबेस्टस की बनी छत की छेद से
कैसा तो बड़ा आसमान दिखता था
कभी लगता था रात को जब आँख लगी होगी
तारा कोई बिस्तर पर लुढ़क गिरेगा
घर जिसके कोनों पर मैने पेंसिल से
अपना नाम लिखा था
कैसी पुरानी सी दिवारें थी
उनपर हरा डिस्टेम्पर
नायलान की उस लंबी सी रस्सी पर
माँ की साड़ी,
पापा का बुशर्ट
माँ की साड़ी से कैसी तो
माँ सी खुशबू आती थी
घर में कैसे गुनगुन करते
मैं और भैया रहते थे
माँ पापा की बातें सुनते
जाने कब सो जाते थे
जब हौले से हाथ जो फिरता
नींद तब खुल जाती थी....
कैसी प्यारी धूप निकलती
कैसे चिड़िया गाती थी
......
फिर आज दोबारा
घर लौट कर जाना है
डिस्टेम्पर पर फीके पड़ते
लिखे नाम पहचानने हैं....
.......
थोड़ा सा बचपन का जादू
बाँध संग ले आना है
बहुत अकेलेपन में सुनने को
पापा की लोरी लानी है.......

5 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

थोड़ा सा बचपन का जादू
बाँध संग ले आना है
बहुत अकेलेपन में सुनने को
पापा की लोरी लानी है.......
--
बहुत भावप्रणव और सुन्दर रचना!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत दिनों बाद कोई पोस्ट आई है ...

बचपन की यादें ...सुकून देती हैं ..सुन्दर प्रस्तुति

अंतर्मन | Inner Voice said...

This is beautiful!

अंतर्मन | Inner Voice said...

Really beautiful expressions!

prabha said...

आपकी इस भावपूर्ण विचारावलि के साथ थोड़ी देर के लिए मैंने भी अपना बचपन जी लिया। लगा जैसे सोच मैं रही थी और शब्द आपने दे दिए......!!
धन्यवाद् बेजी जी,बहुत ही खूबसूरत और जीवंत रचना!