एसबेस्टस की बनी छत की छेद से
कैसा तो बड़ा आसमान दिखता था
कभी लगता था रात को जब आँख लगी होगी
तारा कोई बिस्तर पर लुढ़क गिरेगा
घर जिसके कोनों पर मैने पेंसिल से
अपना नाम लिखा था
कैसी पुरानी सी दिवारें थी
उनपर हरा डिस्टेम्पर
नायलान की उस लंबी सी रस्सी पर
माँ की साड़ी,
पापा का बुशर्ट
माँ की साड़ी से कैसी तो
माँ सी खुशबू आती थी
घर में कैसे गुनगुन करते
मैं और भैया रहते थे
माँ पापा की बातें सुनते
जाने कब सो जाते थे
जब हौले से हाथ जो फिरता
नींद तब खुल जाती थी....
कैसी प्यारी धूप निकलती
कैसे चिड़िया गाती थी
......
फिर आज दोबारा
घर लौट कर जाना है
डिस्टेम्पर पर फीके पड़ते
लिखे नाम पहचानने हैं....
.......
थोड़ा सा बचपन का जादू
बाँध संग ले आना है
बहुत अकेलेपन में सुनने को
पापा की लोरी लानी है.......
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5 comments:
थोड़ा सा बचपन का जादू
बाँध संग ले आना है
बहुत अकेलेपन में सुनने को
पापा की लोरी लानी है.......
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बहुत भावप्रणव और सुन्दर रचना!
बहुत दिनों बाद कोई पोस्ट आई है ...
बचपन की यादें ...सुकून देती हैं ..सुन्दर प्रस्तुति
This is beautiful!
Really beautiful expressions!
आपकी इस भावपूर्ण विचारावलि के साथ थोड़ी देर के लिए मैंने भी अपना बचपन जी लिया। लगा जैसे सोच मैं रही थी और शब्द आपने दे दिए......!!
धन्यवाद् बेजी जी,बहुत ही खूबसूरत और जीवंत रचना!
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